Tuesday, 27 December 2011

badhti jansankhya aur 7 arabwi bachi

लखनऊ के नर्सिंग होम में 1 नवम्बर को जन्मी नर्गिस दुनिया की सात अरबवीं बच्ची है.भारतीय इस बात के लिए फक्र कर सकते हैं कि सात अरबवां बच्चा उनके देश में जन्मा.हलांकि इसपर विवाद भी है लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि दुनिया जनसंख्या विस्फोट के कगार पर खड़ी है.संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक सदी के अंत तक दुनिया की आबादी दस अरब को पार कर जाएगी.इसमें से आधे से ज्यादा एशिया के इलाको में होगी जिसमे भारत भी है.
भारत में बढती आबादी की बात करें तो जनसंख्या आयोग के जरिये हाल ही में जारी किये गये आकड़ों के मुताबिक भारत की जनसंख्या आज के समय में एक अरब,इक्कीस करोड़ को पार कर चुकी है.जो साल २०२० तक डेढ़ अरब के आंकड़े को पार कर जाएगी.
देश में लगातार बढती आबादी से एक चीज़ अंतर राष्ट्रीय स्तर पर हासिल हो गई की भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश बन गया दूसरा ख़ास मकसद जो हमें आज़ादी के बाद कुछ ही दशकों में हासिल कर लेने चाहिए थे वह 6 दशक बाद भी देश हासिल नहीं कर सका जिसके लिए जनसंख्या विस्फोट खास वजह मानी जा सकती है.
पिछले दशकों में जिस तेज़ी से देश की जनसंख्या बढ़ी उतनी तेज़ी से देश के संसाधनों में बढ़ोतरी दर्ज नही की गई.जिसमें देश में अशिक्षा,गरीबी,किसानों की आत्महत्या एवं भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोतरी हुई.
                 तेज़ी से बढती आबादी का ये बुरा असर रहा कि भारतीय अर्थ व्यवस्था उतनी तेज़ी से अपना असर नहीं दिखा पाई.जिसका नतीजा ये हुआ कि उपभोगता बढ़े लेकिन चीज़ें कम होती गईं.अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होते गये.मध्य वर्ग का तो समाज से लोप ही होता गया.हलांकि अब मध्य वर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है.यकीन सबसे बढ़ी परेशानी ये खड़ी हो गई है कि एक अरब से ज्यादा आबादी में सुविधाओं का वितरण कैसे किया जाये?उन्हें जनसंख्या नियन्त्रण के बारे में कैसे जानकारी दी जाये और शिक्षा और सरकारी सुविधाएँ कैसे पहुंचाई जाये.
           दुनिया की आबादी अब सात अरब की संख्या भी पार कर चुकी है और जानकारों की मानें तो सदी के अंत तक ये बढ़कर दस अरब से भी ज्यादा हो जाएगी.ये आँकड़ें चिंता जनक जरुर हैं लेकिन अब भी हालात  उतने विस्फोटक नहीं.
          सत्तर के दशक में भारत की जनसंख्या व्रद्धी दर  २.४ से २.७% के बीच थी जो अब घटकर १.५% रह गई है.तमिलनाडु,मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे ११-१२ राज्य हैं जहाँ की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है.इसलिए उम्मीद की जनि चाहिए कि आने वाले वक़्त में जैसे जैसे हमारा विकास तेज़ होगा और लोगों में जागरूकता आयगी,बढती आबादी में भी गिरावट देखने को मिलेगी.लेकिन इसके लिए किसी तरह की जोर जबरदस्ती की जरूरत नहीं और ऐसी नीति या कोशिश भारत में कारगर भी नहीं हो सकती.अतीत में हम ऐसा करके देख भी चुके हैं,लेकिन नतीजे नकरात्मक.
               बढती आबादी के सन्दर्भ में आज ये चिंता भी ज़ाहिर की जा रही है आज आबादी को ही पर्याप्त सुविधाएँ और खाद्दान्न उपलब्ध नही करवा प् रहे हैं,तो बहुत बड़ी आबादी के लिए ये कैसे मुमकिन होगा?
         असल में यहाँ सवाल खाद्दान्न उपलब्धता से ज्यादा इसके उपभोग का है और ये भी की हमारी नीति किस तरह की है.अमेरीकामे जहाँ हर व्यक्ति पर अनाज कि उपलब्धता १००० किलोग्राम वार्षिक है वहीँ भारत में ये उपलब्धता प्रति व्यक्ति महज़ १८० किलोग्राम है.
                  इसे लेकर सवाल उठाये जा सकते हैं,लेकिन हमें इस सन्दर्भ में अमेरिका और भारत में अनाजों के उपयोग के पैटर्न को भी देखना होगा.अमेरिका में शाकाहार के बजाये मांसाहार का प्रचलन ज्यादा है और हम जानते हैं की एक किलो मांस पाने के लिए ६ किलो अनाज खिलने की जरूरत होती है.
               अमेरिका में तो मवेशियों को अनाज खिलाया जाता है,ताकि उनसे ज्यादा मांस मिल सके.साफ़ है की अगर हम शाकाहार पर जोर दें तो अमेरिका से कम अनाज उपलब्धता के बावजूद हमें ख़ास परेशानी नहीं होने वाली.इसी तरह अनाज का इस्तेमाल खाने के अलावा औद्योगिक कामों के लिए भी बढ़ चढ़ कर हो रहा है फिर चाहें बात बयोफुएल तय्यार करने की हो या गडिओं को चलाने के लिए जरूरी इंधन पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनाल तय्यार करने की जरूरत-इन सबके लिए धड़ल्ले से अनाज का इस्तेमाल किया जा रहा है.
                            इन सारे कारणों से खाद्दान्नों पर दबाव बढ़ा है और पर्याप्त उपलब्ध होने के बावजूद लोग भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं.इसी वजह से अगर हम उपभोग की प्रक्रति में बदलाव ला सकें और अनाज के औद्योगिक प्रयोगों को सीमित करके दुसरे विकल्प अपना सकें तो इस परेशानी का हल मुमकिन है और बढती हुई आबादी को हम भरपूर खाद्दान्न उपलब्ध करवा सकेंगे.ये सरकार की नीतिगत युजना का हिस्सा है कि वह इसे किस तरह हल करना चाहती है.
                  बढती आबादी का एक और जबरदस्त असर सामाजिक सांस्क्रतिक भी होता है.भारत की कुल आबादी का ३३% हिस्सा शहरों में रहने लगा है,और हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है.आने वाले वक़्त में शहरी करण की यह प्रव्रत्ति और भी तेज़ होगी और हम ये भी जानते हैं की आज शहरों में एक बड़े हिस्से के पास समुचित साधन नहीं हैं.





Monday, 26 December 2011

JURM AUR MAHILAYEN.??????

जुर्म की दलदल से दूर रहने वाली महिलाएं भी अब इसमें धसती जा रही हैं.उत्तर प्रदेश में तो हाल बहुत बुरा है,वहां पुलिस के पास 3 दर्जन से ज्यादा ऐसी महिलाओं का रिकॉर्ड है जो हत्या समेत कई जुर्मों में शामिल रही हैं,,,,,,,,,,,


                          जुर्म की दलदल ऐसी अँधेरी सुरंग है,जहाँ से निकलना मुश्किल होता है और इसी दलदल में आज कल महिलाएं भी अपने हाथ आजमां रही हैं..
महिलाओं ने ये साबित किया है की नारी अब सिर्फ लाज शर्म और हत्या का नाम हइ नहीं रही बल्कि वह घर की चौखट से बाहर निकलकर हथ्यार भी लहरा रही है,पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कितनी ही महिलाऐं ऐसी हैं जो समाज के जो समाज के सामने कुछ ऐसी तस्वीर पेश कर रही हैं जो निहायत ही भयानक है.जहाँ कई महिलाओं ने अपने हाथ खून से रंग लिए तो कुछ ऐसी भी हैं जो जुर्म की बादशाह बनना चाहती हैं.ऐसी महिलाओं में उनका नाम सबसे आगे है जिनके पति पहले अपराध की दुनिया से जुड़े थे या अपराध के बेताज बादशाह थे......
                

लूट, हत्या,डकैती और अपहरण जैसे मामलों में औरतों की संलिप्तता पुलिस को भी सोचने को मजबूर कर रही है.मेरठ ज़ोन में ऐसी 3 दर्जन महिलाओं को चिन्हित भी किया जा चूका है.ये ऐसी महिलाऐं हैं जो अपराधियों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही हैं.
             क़त्ल के जुर्म में ऐसी 50 से ज्यादा महिलाऐं सैर कर चुकी हैं.जिस्म की हवस व पैसे की ललक ने ऐसी औरतों को 
अपराधी बना दिया.कुछ ऐसी भी हैं जिनके लिए पति परमेश्वर न होकर दुश्मन बन गये और उन्होंने अपने ही हाथों से अपनी मांग उजाड़ ली.
           सामाजिक रिश्तों की बुनियाद लगातार चटक रही है.खूबसूरत चेहरों के पीछे छुपे काले दिल की हकीकत ने कई लोगों की तो जान ही ले ली.महिलाओं के जरिये किये जा रहे अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है.पुलिस इसे चिंता का विषय मान रही है.क्यूंकि महिलाऐं उन्हें चकमा देने में माहिर होती हैं.
           हत्याओं के मामले में महिलाओं की आपराधिक दस्तक को मज़बूत कर दिया.इन पर अल्पविराम लगाना बहुत जरूरी है.खातील महिलाओं की सूचि तो बहुत लम्बी है.लेकिन चाँद घटनाओं पर ही गौर करने की ज़हमत की जाये तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
       कुछ साल पहले मेरठ के आदिवक्ता रशीद अली की हत्या का खूब चर्चा में रहा.दरअसल,उनकी पत्नी फरजाना के उत्तर प्रदेश पुलिस के एक दरोगा पंकज वर्मा से नाजायज़ ताल्लुकात थे.वह दोनों अपने संबंधों को और बढ़ाना चाहते थे,लेकिन इससे पहले इस बात की पहल हो पति रशीद उनकी राह का काँटा बन गया.इन दोनों ने मिलकर पहले पति रशीद की हत्या की फिर उसकी लाश को कार में ले जाकर रुड़की नहर में फ़ेंक आये.दोनों इस हत्या के आरोप में जेल जरुर गये,लेकिन कत्ल के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे रह चुका दरोगा पंकज वर्मा अभी भी पुलिस की नौकरी बजा रहा है.ये अलग बात है की मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.
                 मेरठ की ही एक महिला रा जेंद्री ने अपने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति और सास ससुर की हत्या कर दी.सविता नामक एक महिला ने अपने प्रेमी विक्रांत को हमेशा के लिए पति सट्टे को ज़हर देकर मार डाला.जाहिदा परवीन ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति आकिल की हत्या कर दी.पति का गुनाह सिर्फ इतना था की वह पत्नी की बेलगाम हरकतों पर लगाम लगाने का प्रयास करता था.
                      मेरठ में संतोष नामक महिला ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपने पुत्र की विवाहित युवा प्रेमिका की हत्या का प्रयास किया और उसकी बेटी को पेचकस से गोद कर मार डाला.
                   एक महिला ऐसी भी है जिसने जेल जाकर भी सबक नही लिया.2 साल पहले अनीता नामक नव विवाहिता ने ब्लैक मेल करने पर एक सूत व्यापारी की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी थी जिसके कारण उसे जेल भी जाना पड़ा था.ससुराल वालों ने उसे माफ़ कर दिया,लेकिन जेल से आकर वह दबंग और आपराधिक प्रव्रत्ति की हो गई.सास की बंदिशें उससे सहन नहीं हुई तो सहारनपुर में उसने अपनी सास की पेचकस से गोदकर हत्या कर दी.फिलहाल अनीता जेल से बाहर है.
                26 जून 2004 को सहारनपुर में चौकीदार राम स्वरूप की उसकी पत्नी शांति ने बेटे व दामाद के साथ मिलकर हत्या कर दी.शांति बुढ़ापे में विधवा इसलिए हुई क्यूंकि वह पति की जगह बेटे को नौकरी दिला कर शराबी पति लो सबक सीखाना चाहती थी.
                    इसी तरह बुलंद शहर में एक व्यापारी दीपक को उसकी ही साली चित्रा ने मार डाला और पति के साथ मिलकर शव को बाहर फ़ेंक दिया.इसी जिले में 3 साल पहले शिकार पुर में एक महिला डॉक्टर ने अपने अध्यापक प्रेमी के साथ मिलकर अपने डॉक्टर पति की ज़हर देकर व गला दबाकर हत्या कर दी थी.हलांकि प्रेमी ने उसकी संपत्ति हड़पने के बाद बेवफाई दिखाई और महिला को भी मौत की चौखट पर धकेल दिया था.
                   खून से हाथ रंगने में युवा स्कूली छात्राएं तक अछूती नहीं रही.मेरठ के चौधरी चरण सिंह की एक छात्रा सुलक्षणा ने ब्लैक मैलिंग से पीड़ित होकर अपने 2 छात्र दोस्तों के साथ मिलकर एक नकली सी.बी.आई. इंस्पेक्टर आमिर को बेरहमी से मार डाला.इतना ही नहीं उन्होंने बड़ी सफाई से लाश को भी ठिकाने लगा दिया.लेकिन तीनों कातिल पुलिस के शिकंजे में आ ही गये.
                    बागपत की एक युवती ने विवाह के एक सप्ताह बाद ही अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति का खून कर दिया.वह उसे हनीमून मनाने के बहाने जम्मू ले गई और एक होटल में उसे ठिकाने लगा दिया.
                               हत्याओं से अलग लूट,डकैती के साथ चोरी के मामलों में भी औरतों का हाथ समाज के लिए खतरे की घंटी साबित हो रहा है.जिसकी ख़बरें आये दिन मीडिया में आती रहती हैं.पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं,जो महिलाओं को अपने गिरोह में शामिल कर उन्हें अपराध के हथकंडे सीखाते हैं.अक्सर रेलों में वारदात करने वाला ज़हर खुरानी गिरोह भी महिलाओं का इस्तेमाल करता आया है.
              और कुछ देखे तो मेरठ में कार सवार महिलाओं ने एक सर्राफ से जेवरात लूट लिए लेकिन वह पकड़ी गई थीं.इन महिलाओं का अपराध से वास्ता यहीं ख़त्म नही हुआ बल्कि लूट के एक मामले में कुछ समय बाद ही उन्हें परतापुर पुलिस ने फिर से गिरिफ्तर कर लिया.ये गिरोह बनाकर लूट और चोरियां करती थी.
               इसी तरह एक महिला ने एक कार सवार से लिफ्ट ली और उससे हथियार की नोक पर नगदी लूट ली.28 अगस्त को खर्खोंदा के एक बैंक में घुसकर २ युवतीओं ने लोगों की जेबों पर हाथ साफ़ कर दिया.
                मेरठ पुलिस ने एक ऐसी तमंचा फैक्ट्री पकड़ी है जिसका संचालन खुद एक महिला ही कर रही थी.शामली में एक युवती एक डॉक्टर से चौथ वसूल करती पकड़ी गई.वह लोगों को अपहरण की धमकियाँ देकर धन  वसूला    करती थी.सहरान  पुर ने सट्टे के एक बड़े  रेकेट  का पर्दा  फाश  किया,जिसमे  1 लाख नगदी बरामद करने के साथ ही एक युवती समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया.युवती मोनिका के तार एक सट्टा किंग से जुड़े थे और वह बी,ए. की छात्रा थी.पुलिस के मुताबिक वह खुद मोटर साइकिल पर घूम कर पैसा इकठ्ठा करती थी.
                     अपराध में महिलाओं की संलिप्तता बहुत कम होने की वजह से यूँ तो पुलिस में महिलाओं का आपराधिक रिकॉर्ड रखने की पम्परा नहीं थी लेकिन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश उनका पूरा डाटा रख रही है और अब तक ऐसी 3 दर्जन से भी ज्यादा औरतों को चिन्हित भी किया जा चुका है जो पेशे वर होकर अपराध कर रही हैं.पुलिस अधिकारी मानते हैं की अपराध जगत से जुड़े लोग महिलाओं को ढाल बनाकर इस्तेमाल करते हैं.बखौल एक महिला पुलिस अधिकारी' ''अपराध करने वाली महिलाओं की मानसिकता को समझना मुश्किल काम है.उन्हें आमतौर पर रहमदिल माना जाता है और इसी के चलते वह छल करती हैं''.
                                      जिंदगी जीने के अंदाज़,आचार विचार और संस्कारों पर ध्यान दिया जाये तो अपराध की दलदल की तरफ बढ़ रहे महिलाओं के क़दमों पर अंकुश लगाया जा सकता है.मनोरोग चिकत्सों की माने तो महिलाओं में आपराधिक प्रव्रत्ति बढ़ रही है.महिला सशक्ति करण में नकरात्मक फैसला लेने की सोच ने भी जन्म लिया है.परिवर्तन के दौर में महिलाओं ने जीने का अंदाज़ बदला है.ऐसे में मानसिक रोगों को भी नकारा नहीं जा सकता.आसामान्य व्यवहार और आसामान्य मानसिक संतुलन भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.

Sunday, 25 December 2011

chritmas ka itihaas varshon purana...

आज 25 दिसम्बर है..आज क्रिसमस डे है...यानी बड़ा दिन...इसलिए सबसे पहले आप सभी को मेरी तरफ से क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें....
क्रिसमस का ये त्यौहार कई वर्षों से इसी मनाते चले आये है...और अब तो हर धर्म के लोग इसे मनाते है...क्रिसमस का इतिहास कई वर्षों नही बल्कि चार हजार वर्ष पुराना है.बल्कि क्रिसमस की परम्परा ईसा के जन्म से शताब्दियों पुरानी है.क्रिसमस के दिन उपहारों का लेन देन,प्रार्थना गीत,अवकाश की पार्टी और चर्च के जुलूस सभी हमें बहुत पीछे ले जाते हैं.ये त्यौहार सोहार्द,आह्लाद और स्नेह का सन्देश देता है.एक शोध के अनुसार क्रिसमस एक रोमन त्यौहार सेंचुर्नेलिया का अनुकरण है.सेंचुर्नस रोमन देवता है.ये त्यौहार दिसम्बर के मध्यान से जनवरी तक चलता है.लोग तरह तरह के पकवान बनाते है...दोस्तों से मिलते है,पहले भी उपहारों का अदल बदल होता था.फूलों और हरे पेड़ों से घर सजाये जाते थे.यह तक की स्वामी और सेवक अपना स्थान भी बदलते थे.....


सौन्दर्यबोध के अनुसार कालांतर में ये त्यौहार बरुमेलिया यानि सर्दियों के बड़े दिन के रूप में मनाया जाने लगा.ईसवीं सन की चौथी शती तक ये त्यौहार क्रिसमस में विलय हो गया.क्रिसमस मनाने की विधि बहुत कुछ रोमन देवताओं के त्यौहार मनाने की विधि से उधार ली गई है.कहते  हैं के ये त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में सन 98 से मनाया जाने लगा.सन 137 में रोम के बिशप ने इसे मनाने का स्पष्ट  एलान किया सन 350 में रोम के एक अन्य बिशप्युलिअस ने दिसम्बर 25 को क्रिसमस के लिए चुनना था.इतिहासकारों की भी राये मिलती है दिसम्बर 25 दिसम्बर ईसा  का जन्म दिन नहीं था.इस  प्रश्न  का उत्तर कहीं नहीं मिलता की 25 दिसम्बर ही ईसा मसीह के जन्म का दिन है.न तो बाइबल इसका स्पष्ट उत्तर देती है और न ही इतिहासकार ईसा की जन्म तिथि कीघोषणा करते हैं.ऐसे तथ्य भी मिलते हैं,जिनसे स्पष्ट होता है कि ईसा का जन्म सर्दियों में नहीं हुआ था.यहीं पर ये तथ्य हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि क्रिसमस सर्दियों में ही क्यूँ मनाया जाता है.
          एक शोध हमें इस त्यौहार का मूल मेंसो पोटामिया में खोजने को मजबूर करता है.मेंसो पोटामिया में लोग अनेक देवताओं पर विश्वास करते थे.लेकिन उनका सबसे बड़ा देवता मर्दुक था.हर साल सर्दियों के आने पर माना जाता था कि मर्दुक अव्यवस्था के दानवों से युद्ध करता है.मर्दुक कि इस संघर्ष कि मदद के तौर पर नये साल पर त्यौहार मनाया जाता था.मेंसो पटेमिया का राजा मर्दुक के मन्दिर में देव प्रतिभा के समक्ष वफादारी की कसम खाता था.परम्पराए राजा को साल के आखिर में युद्ध का आमन्त्रण देती थी ताकि  वह मर्दुक की तरफ से युद्ध करता हुआ वापिस लौट सके.अपने राजा को जिंदा रखने के लिए मेंसो पोटामिया के लोग एक अपराधी का चयन करके उसे राजसी वस्त्र पहनते थे.उसे राजा का सम्मान और सभी अधिकार दिए जाते थे और आखिर में असली राजा को बचाने के लिए नकली राजा कि हत्या कर दी जाती थी.क्रिसमस के अंतर्गत मुख्य आवाज़ भगवान् को खुश करने की है.
             
पर्शिया और बेबिलोनिया में ऐसा ही एक त्यौहार सेंसिया  नाम  से मनाया  जाता था.बाकि सभी रस्मों के साथ साथ इसमें  एक और रसम थी कि दासों को स्वामी और स्वामियों को दास बना दिया जाता था.
             युरेपियन लोग चुड़ेलों,भूतों और बुरी  रूहों  में विश्वास करते थे.जैसे  ही सर्दी के छोटे  दिन और लम्बी  ठंडी रातें आती,लोगों के मन में डर समां जाता कि सूर्य देवता वापिस नहीं लौटेगे.सूर्य को वापिस लाने के लिए इन्ही दिनों ख़ास रीति रिवाजों का पालन  होता.समारोह  का आयोजन  किया जाता.
          स्कान्दिनाविया में सर्दी के महीनों में सूरज दिनों तक गायब रहता,सूरज की वापसी के लिए 35 दिन के बाद पहाड़ की चोटियों पर लोग स्काउट भेज देते.पहली रश्मि के ईद आने की शुभ सूचना के साथ ही स्काउट वापिस लौटते.इसी अवसर का यूल ताईद नामक त्यौहार मनाया जाता.आग के आस पास खान पान का आयोजन चलता है.अनेक जगहों पर लोग पेड़ों की शाखाओं से सेब लटका देते हैं.जिसका मतलब होता है कि बसंत और गर्मियां जरुर आएगी.
         पहले यूनान में  भी इससे मिलता जुलता एक एक त्यौहार  मनाया जाता था .इसमें  लोग देवता क्रोनोस  की मदद करते थे .ताकि वह ज्यूस  और सभी  साथी  बुरी  रूहों लड़  से सके.
        कुछ लोग ये भी कहते  हैं कि ईसाइयों का क्रिसमस त्यौहार नास्तिकों के दिसम्बर समारोह को चुनौती है.क्यूंकि 25 दिसम्बर मात्र रोम मनसो पोटामिया,बेबीलोन,या यूनान के समारोह का दिन नहीं था,बल्कि उन पश्चिमी लोगों के लिए भी था,जनका धर्म ईसाइयत के खिलाफ था.

ईसाईयों का धर्म ग्रन्थ बाइबल के नाम से जाना जाता है.मूलत: ये यहुदिओं और ईसाईयों का साझा धर्म ग्रन्थ है.जिसके ओल्ड टेस्टामेंट न्यू टेस्टामेंट दो भाग हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्राइस्ट के जन्म से पहले के हालात अंकित हैं.इसमें 39 किताबें हैं,न्यू टेस्टामेंट में ईसा का जीवन,शिक्षाएं एवं विचार हैं.इसमें  27 किताबें हैं.यानी  बाइबल 66 किताबों का संग्रह है.1600 सालों में 40 लेखकों ने लिखा.इसमें मिथ्कीये ,काल्पनिक  और इतिहासिक  प्रसंग  हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्रीस्ट के जन्म  विषयक भविष्य वाणी हैं.एक कहानी के अनुसार बढई युसूफ और मंगेतर मेरी नजरेन में रहते थे.मेरी को खवाब में दिखा कि उसे देव शिशु के जन्म के लिए चुना गया है.इसी बीच वहां के राजा ने नये कर लगाने के लिए लोगों के पंजी करण की घोषणा की.जिसके लिए युसूफ और मेरी को अपने गाँव बेथलहम जाना पड़ा.मेरी गर्भवती थी.कई दिनों के सफ़र के बाद वह बेथलहम पहुची.तब तक रात हो चुकी थी.उसे सराय में आराम के लिए कोई जगह नहीं मिली.जन युसूफ ने विश्राम घर के रक्षक को बताया की मेरी गर्भवती और उसका प्रसव समय निकट है तो उसने पास के पहाड़ों की उन गुफाओं के बारे में बताया,जिनमें गडरिये रहते थे.युसूफ और मेरी एक गुफा में पहुचे.युसूफ ने खुरली साफ़ की.उसमे नर्म,सूखी घास का गद्दा बनाया.अगली सुबह वहीँ मेरी ने शिशु को जन्म दिया.देव कि इक्छा के अनुसार उसका नाम युसूफ रखा गया.कालांतर में १२ साल के ईशु ने ही धर्मचर्या में श्रोताओं को मुग्ध कर लिया.तीस साल की उम्र में अपने चचेरे भाई से बप्तिस्मा याबी अमृत लिया.शासक द्वारा जान की हत्या के बाद वह खुद बप्तिस्मा देने लगे.यीशु के प्रचारों के कारण यहूदी शासक और कट्टरपंथी उनके विरोधी बन गये.उनपर अनेक अपराध थोपे गये.कोई मारे गये.उन्हें सूली पर लटकाया गया.म्रत्यु दंड दिया गया.
        आज क्रिसमस का त्यौहार हर साल ईसा मसीह के जन्म दिन के आविर्भाव के उपलक्ष में मनाया जाता है.भले ही इसके मूल में अनेक देशों की परम्पराओं का सम्मिश्रण हो...........

        

Saturday, 24 December 2011

sankat kaal mein jansanchar ki bhumika..........

प्राक्रतिक आपदा के रूप में जब अचानक महाविनाश का तांडव नाचता है तब जनसंचार की भूमिका उस विनाश में घिरे लोगों के लिए भगवान से कम नहीं होती है.प्राक्रतिक आपदा आने पर सबसे पहले बिजली के कनेक्शन टूटते हैं और कनेक्शन टूटने से आपदा-ग्रस्त लोगों के घरों में घनघोर अँधेरा छा जाता है क्यूंकि इन्वेर्टर या जेनरेटर आदि भी सीमित समय तक ही चल पाते हैं,बिजली न होने से इसकी चार्जिंग नहीं हो पाती.इसके साथ ही फ़ोन,मोबाइल,कंप्यूटर आदि से संचार के सारे रस्ते बंद हो जाते हैं.जब आपदा ग्रस्त लोगो का संपर्क दूर बैठे अपने रिश्तेदारों से भी टूट जाता है तो ऐसे समय में जनसंचार माध्यमों में कार्यरत रिपोर्टर अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें रिश्तेदारों से जोड़ने का प्रयास करते हैं.
                    यानी पल पल की ताज़ा जानकारी देने के सीधे प्रसारण से वे जुड़ जाते हैं.अपने मोबाइल या कैमरे से तुरंत वीडियो बनाकर हेड-ऑफिस भेजते रहते हैं और हेड ऑफिस से न्यूज़ प्रोडुसेर एंकर के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ तुरंत लगाकर लोगों को पल पल कि जानकारी देते रहते हैं.जैसे जब बिहार में बाढ़ आई थी तो जनसंचार माध्यमों के द्वारा लोगों तक खबर पहुचाई गई कि वहां पर युद्ध स्तर पर मदद की जाने कि जरूरत है.
         कोसी नदी का कहर टूट जाने पर भी अख़बारों में भी विश्लेषण शुरू हो गया कि आखिर प्रतिवर्ष बिहार में बाढ़ क्यूँ आ जाती है.खोजी पत्रकार नये नये तथ्य खोजकर लाये उनमें से एक खुलासा ये भी हुआ कि कोसी नदी के तट बंध का भी विधिवत शिलान्यास 14 जनवरी 1995 को किया गया था.इतने वर्षों में कई बार कोसी नदी का तटबंध टुटा है,जिसमें व्यापक पैमाने पर भरी तबाही हुई है.बिहार में राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभारी आलोक चन्द्र ने अपने लेख में बाढ़ से पहले और बाढ़ के बाद लेख के जरिये चौंका देने वाले कुछ तथ्य पेश किये कि कोसी तटबंध के निर्माण और मरम्मत कार्य के लिए बिहार सरकार ने दो भारतीय ठेकेदारों को नेपाल में तैनात कर रखा था.इन दो ठेकेदारों ने नेपाल के दो छोटे कांट्रेक्टरों को ये काम सौंप दिया.ये दोनों छोटे कांट्रेक्टर बीते कई माह से ही इस काम के लिए और ज्यादा पैसे की मांग कर रहे थे.मांग पूरी नहीं होते देखकर इन ठेकेदारों ने स्थानीय युवकों को भड़काकर काम में बाधा खड़ी कर दी.बाँध टूटने के कुछ दिन पहले वीरपुर से एक इंजीनियर के जयिये तार-जाली,पत्थर,बोल्डर,जेनरेटर के साथ साथ मजदूरों की एक टीम गई.इस टीम ने तटबंध पर उगे पेड़ों एवं झाड़ियों को काटकर उसे मज़बूत करना चाहा,लेकिन यहाँ पेड़ों और झाड़ियों को ये कहकर नहीं काटने दिया गया कि ये कानून के खिलाफ है.स्थानीय लोगों के मुताबिक अगर उस दिन पेड़ और झाड़ी काटकर बाँध बाँधने दिया जाता तो ये कयामत न आती.खबर के मुताबिक ठेकेदारों ने 14 लोगों के खिलाफ शिकायत करते हुए स्थानीय प्रशासन को एक अर्जी दी थी कि ये लोग काम नहीं करने दे रहे हैं.इस सिलसिले में चार लोग गिरफ्तार भी हुए,लेकिन राजनीतिक पार्टियों के दबाव में उन चारों को फ़ौरन रिहा कर दिया गया.इस खबर से ये पता चलता है कि कोसी को कोसने के बजाये नेताओं को कोसा जाना चाहिए.जिनकी लापरवाही से तटबंध टूटे.टी.वी .पर उन दिनों चर्चा-परिचर्चा के कार्यक्रमों में भी मंत्रियों से विचार-विमर्श किया गया और उन्हें चेतावनी दी गई.इन्ही चर्चाओं में एक और राज़ खुलकर आया की बिहार के भ्रष्ट नेता बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए मिलने वाले करोड़ों रूपये के सरकारी अनुदान पर नज़रें गड़ाये बैठे रहते हैं.
                                   

कहीं अचानक आतंकवादी बम विस्फोट करते हैं तो फ़ौरन उस जगह से जुड़े रिपोर्टर वीडियो बनाकर अपने चैनल को भेज देते हैं और चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में फ़ौरन प्रसारित कर देता है.२ नवम्बर 2008 को मुंबई के ताज होटल.ओबराई और नरीमन हाउस को आतंकवादिओं ने अपना निशाना बनाया तो मीडिया ने पूरे 60 घंटे तक के खौफनाक मंज़र की पल पल की 
ताज़ा खबर पूरी दुनिया के सामने पेश की.इतना ही नहीं मीडिया ने पूरी तरह खोजकर सबूत पेश किये. जिससे पूरी दुनिया को पता चल गया कि ''इन आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तय्यबा का हाथ है जिसे आई.एस.आई का आशीर्वाद हुआ है.सब जानते हैं कि लश्कर के उद्देश्य क्या हैं-वह ईसाईयों,यहूदिओं और हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन मानता है.इसका मकसद है इस्लाम को हरा झंडा वाशिंगटन,यरूश्ल्य और नई दिल्ली पर फेहराना''.आतंकवादिओं के इन मंसूबों से पूरी दुनिया को परिचित करने में मीडिया ने एहम भूमिका निभाई.होटल के अन्दर फंसे भारतीय और विदेशी लोगों के साथ उनके परिजनों को जोड़ने में भी मीडिया का सराहनीय योगदान रहा.देश विदेश में बसे उनके परिजनों को पूरे 60 घंटे तक के मंज़र की पल पल का आँखों देखा हाल दिखाया और सुनाया गया.इन धमाकों से जुड़े हर पहलु को सामने लाने में मीडिया ने कोई कसार नहीं छोड़ी.पकड़े गये एक आतंकवादी अमजद कसाब के घर तक कि रिपोर्ट ख़ुफ़िया कैमरों के ज़रिये पेश करने का काम भी मीडिया कर्मियों ने ही किया.
            

युद्ध काल में मीडिया कि भूमिका और भी अहम् हो जाती है.युद्ध काल में सैनिकों तक सन्देश पहुचाने के लिए रेडियो और टी.वी बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं.रेडियो एक तरफ सैनिकों को देश दुनिया के समाचार सुनाता है,तो दूसरी ओर उसके माध्यम से युद्ध के मोर्चे के समाचार संसार को सुनाता है.1990 में सेटेलाइट से जुड़ने के बाद सी.एन.एन ने अमेरिका द्वारा कुवेत पर किये गये हमले का सीधा प्रसारण करके पहली बार युद्ध काल की रिपोर्टिंग के मायने बदल दिए.लोगों ने पहली बार युद्ध का सीधा प्रसारण देखा मिसायलें चलते हुए.बड़ी-बड़ी बस्तिओं को आग के हवाले होते हुए देखा उसके बाद अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हवाई हमले और उसके बाद उन दोनों भवनों को धराशाई होते देखा.अमेरिका द्वारा 1990 में इराक पर हमला और उसके बाद जवाबी कार्यवाही के रूप में ओसामा बिन लादेन का ट्रेड सेंटर पर हवाई हमला दिखाकर युद्ध की निसरारता को भी दिखने का काम किया.मीडिया के माध्यम से इस युद्ध को लेकर यह सच निकलकर सामने आया कि तेल के कुँओं पर कब्जा करके इराक को कमज़ोर बनाने के लिए अमेरिका ने यह युद्ध इराक पर थोपा था.युद्ध से पहले अमेरिका उन अस्त्रों को पूरी तरह ख़त्म करके पूरी मानवता को बचाना चाहता है.मीडिया ने तटस्थ होकर इस सन्दर्भ में अपनी भूमिका निभाई और अमेरिका के नापाक इरादों की पोल संसार के सामने खोल दी.
 इस तरह हम मीडिया कि भूमिका विभिन्न रूपों में देख सकते हैं...

Thursday, 22 December 2011

van raksha ki bhawna kyun padh rahi hai kamzoor?

वैसे तो पर्यावरण रक्षा में वनों की महत्वपूर्ण भूमिका को हमेशा स्वीकार किया गया है,लेकिन जलवायु बदलाव के बढ़ते खरते के मद्देनज़र कार्बन डाई ऑक साइड सोखने की अपनी भूमिका के कारण उनका महत्व और भी बढ़ गया है.चिंता की बात ये है की इसके बावजूद वनों के विनाश में कमी नहीं आई है.
अनुमान है कि पिछले एक दशक में ही पुरे विश्व के वन के इलाकों में लगभग चार लाख वर्ग किमी.की कमी आई है.विश्व स्तर पर ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे कुछ देशों में वनों का विनाश व्यापक चिंता का विषय बना है.जबकि कुछ विकसित देशों के बारे में माना जाता है कि उन्होंने इसकी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा लिए हैं.लेकिन अगर ये देखा जाये कि ये विकसित देश लकड़ी का बड़े पैमाने पर आयात कहाँ से करते हैं तो स्पष्ट हो जायेगा कि गरीब देशों में वनों का विनाश इन विकसित देशों की मांग की आपूर्ति के लिए ही हो रहा है.
          
        भारत जैसे विकासशील देशों के बारे में प्राय: यह माना जाता है कि यहाँ के वन व पर्यावरण विभाग काफी सक्रिय हैं और यहाँ जंगलों की स्तिथि कुल मिलाकर ठीक ठाक है.सरकारी आंकड़े भी यही बताते हैं.अगर इन्हें सच माना जाए तो भारत के वन आच्छादित इलाकों में वर्ष 1997 -2007 के बीच 0 .5 प्रतिशत हर साल की बढ़ोतरी है.मगर आज़ाद शोधकर्ता इन सकारी आंकड़ों को चुनौती देते रहे हैं.इस चुनौती क मुख्य आधार ये रहा है कि सरकारी आंकड़ों में वनों को बहुत दबे दायरे के तौर पर परिभाषित किया जाता है.
                    जहाँ थोड़े से पेड़ हैं या जहाँ प्राक्रतिक वनों को खत्म करने के बाद व्यापारिक महत्व के विदेशी प्रजाति के पेड़ लगाये गये हैं उन्हें भी वन के इलाके के रूप में गिन लिया जाता है.क्या ये सही है?प्राक्रतिक वनों में मिश्रित प्रजातियों के पेड़ घने रूप में होते हैं व इनके निचे तरह तरह के छोटे पेड़-पौधे,झाड़ियाँ व घास खूब पनपते हैं.इस माहौल में बहुत तरह के पशु पक्षियों,कीट पतंगो को अनुकूल वातावरण मिलता है.इन पेड़ पौधों के नीचे की मिटटी बहुत उपजाऊ व सजीव होती है,जिसमे लाखों तरह के सूक्ष्म जीव पनपते हैं.इन मिश्रित प्राक्रतिक वनों में जैव विविधता संजोने और कार्बन डाई ऑक साइड सोखने की अदभुत ताखत होती है.इन जंगलों में बाढ़ को रोकने और विभिन्न प्रकार के पोष्टिक खाद व जड़ी बूटियां देने की पर्याप्त ताखत होती हैं.
जल-संरक्षण में इनका काफी योगदान होता है.दूसरी ओर व्यापारिक प्रजातियों के मोनोकल्चर या मुख्य रूप से एक ही पेड़ के बड़े इलाके में किये गये प्लान्टेशन प्राक्रतिक वनों जैसी बहुपक्षीय भूमिका निभाने में नाकामयाब होते हैं.
                       विदेशी प्रजातियों के मोनोकल्चर तो और भी हानिकारक सिद्ध हुए हैं,क्यूंकि वे किसी अन्य स्तिथि के लिए उपयोगी थे,यहाँ उन्हें ज़बरदस्ती प्रवेश दिला दिया गया है.यूकेलिप्ट्स के प्लान्टेशन अपनी जल सोखने की ताखत के लिए जाने जाते थे,पर उन्हें ऐसे इलाखों में भी लगा दिया गया जहाँ पानी का संकट है.इस तरह जल संरक्षण करने की जगह उनकी भूमिका जल-संकट बढाने की हो गई.वैसे भी प्लान्टेशन का मुख्य मकसद तेज़ी से बढ़ने वाले पेड़ लगा कर उन्हें एक निश्चित अवधि में काटना होता है.अत: प्लान्टेशन को स्थायी हरियाली नहीं मान सकते.इसलिए वन आच्छादित इलाके के सही अनुमान लगाने के लिए इस तरह के प्लान्टेशन को उसमे शामिल नहीं करना चाहिए.अगर इन प्लान्टेशन इलाकों को हटाकर उपलब्ध आंकड़ों का आकलन किया जाये तो पता चलता है कि भारत के प्राक्रतिक वन हर साल लगभग 2 . 1 हर साल कि दर से कम हो रहे हैं.इसलिए ये बहुत जरूरी है कि वनों की वास्तविक स्तिथि की समझ देश में बनाई जाये और उनके अनुकूल जरूरी कदम उठाये जाये.

                        इसके लिए वन विभागों व अधिकारीयों के नज़रिओं में भी बदलाव करने की जरूरत है.हमारी वन नीति के एक और पक्ष पर गौर करने की जरूरत है.हिमालय के सन्दर्भ में कभी गांधीजी की शिष्या मीरा बहन ने वन अधिकारिओं से एक महत्वपूर्ण बहस चलाई कि किस तरह चीड़ जैसे शंकुधारी पेड़ों को महत्व देने से चौड़ी पत्ति वाले बांज जैसे पेड़ हाशिये पर चले गये.चीड़ से लुगदी और लीसा मिलता था,इसलिए इसका व्यापारिक महत्व बढ़ गया.लेकिन गाँव वासिओं के पशुपालन,जल व मिटटी संरक्षण की द्रष्टि से बांज जैसे चौड़ी पत्ति के पेड़ ही अधिक उपयोगी थे.इस तरह वनों का चरित्र बदलने से गाँव वासिओं ने वनों के संबंध में भी बदलाव आने लगा और उनके मन से अपने वनों की रक्षा की भावना कमज़ोर होने लगी.इसलिए जब वनों की रक्षा की बात की जाती है तो मिश्रित प्राक्रतिक वनों की रक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए.आज ज़्यादातर घने प्राक्रतिक वन आदिवासी बहुल इलाकों में ही बचें हैं.उन्होंने हजारों सालों तक इन वनों का उपयोग अपनी जीवन शैली के अनुकूल किया और वे नष्ट नहीं हुए.पर अब कोई एक खनन परियोजना एक ही झटके में पूरा वन उजाड़ देती है.चिपको आन्दोलन के दौरान २०० से ३०० पेड़ों के कटान को रोकने के लिए भी आन्दोलन होता था.चर्चा होती थी,पर अब कई परियोजनाओं के लिए एक लाख या उससे भी ज्यादा पेड़ कट जाते हैं और उस इलाके के बाहर किसी को खबर भी नहीं होती.
                        जिन वन इलाकों की कटाई पहले वर्जित मानी गई थी,आज वहां भी इसकी मंज़ूरी दी जा रही है.जहाँ खनन जैसे काम प्रतिबंधित थे,वहां से भी प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं.इन प्रव्रत्तियों के पीछे मूल बात यही है की पर्यावरण पर पैसा और संरक्षण पर सौदेबाजी हावी है.लेकिन वनों के बहु पक्षीय महत्व को रेखांकित करते हुए हमें वन विनाश पर रोक लगानी ही होगी....
 

Monday, 19 December 2011

vigyapan dekhne ka sukh.......

हम अख़बार हो या दूरदर्शन,उसमे सिर्फ विज्ञापन देखते हैं.समाचार पत्र की खबरें और टेलीविज़न कार्यालय तो तकरीबन समान रूप से उबाऊ हैं.उनसे क्या उम्मीद रखना?वही प्रेम के ट्री एंगल धारावाहिक या फूहड़ कॉमेडी के नाम पर बनाये गये प्रतियोगी कार्यक्रम,बस एक ही राहत है.रिमोट नाम की सुविधा टेलिविज़न सेट के साथ उपलब्ध है.जब चाहा किसी भी चैनल से छुट्टी पा ली.
  विज्ञापन से अपना काफी ज्ञानवर्धन होता है.बाज़ार में क्या क्या उपभोगता पदार्थ उपलब्ध हैं?उनके साथ क्या क्या रियायतें हैं?इधर,शम्पू के सेशे घर में भरे पड़े हैं.पता लगा कभी कॉफ़ी,तो कभी बिस्कुट के साथ आ गये.कहावत है कि गंजे को ऊपर वाला नाखून नहीं देता है.हम गंजे भी हैं और नाखूनों से लैस भी.अपने पल्ले ये जरुर पड़ा है कि गंजे को आज का बाज़ार सैशे इफरात से देता है.
               विज्ञापन को नियमित रूप से देखकर हमने यह भी सीखा है कि आजकल टू इन वन और थ्री इन वन का जमाना है.कई साबुन ऐसे हैं कि एक लो तो दूसरा फ्री मिलता है.कई 2 खरीदने पड़ते हैं,एक मुफ्त पाने को.मंजन का भी यही किस्सा है.हमें लगता है कि पूरा का पूरा बाज़ार उतारू है कि पूरा देश शैम्पू से सिर धोये,साबुन से मल मल कर नहाये और मंजन से जी भर कर दांत रगड़े.मतलब उपभोगता के सामान्य स्वास्थ्य का ध्यान बाज़ार पूरा निष्ठा से रखता है,ठीक वैसे ही जैसे सरकारी अस्पतालों के जरिये,सरकार देश कि जनता का रखती है.इन दोनों में से किसी के चंगुल में फसा दो तो आदमी की मुक्ति कठिन है.
    हमें लगता है कि बाज़ार का प्रयास है कि ग्राहक उससे जुड़े.थोड़े दिन टू इन वन का आकर्षण उन्हें खींचता है,फिर एक ही ब्रांड के साबुन,पेस्ट या शैम्पू कि उपभोगता को आदत पड़ जाती है.बाज़ार को इसी मुबारक दिन का इंतजार रहता है.उसका मार्केटिंग प्रतिनिधि मन ही मन अपनी पीठ ठोकता है और बड़ बड़ाता है'' बच्चू ,अब बचके कहाँ जाओगे''.धीरे धीरे एक कि कीमत में मंजन,साबुन या पेस्ट इकलोते रह जाते हैं.कभी कभी उस अकेले कि भी कीमत बढ़ जाती है.
       यही हाल सरकारी अस्पताल का भी है.एक बार जिस बीमार को वहाँ का चस्का लगा,वह ठीक होना तो दूर दिनोदिन और बीमार होता रहता है.आंख का ओपरेशन एक नही डॉक्टरों कि गलती से तीन बार करवाना पड़ता है.मगर वह बेचारा क्या करे इसके लिए कुछ हद तक उसकी आर्थिक बदहाली भी ज़िम्मेदार है.कहाँ से वह हर बार निजी अस्पताल या डाक्टरों कि हजारों रुपए कि फीस जुटाए और उन तक जाने कि हिम्मत करे.बात डॉक्टर तक ही सीमित नहीं है.उसकी लिखी दवा खरीदना कौनसा आसान है?उनका मूल्य भी कौनसा कम आसमानी है?आलम ये है कि जान जाये पर दवा न आये,एक सदस्य से पूरे परिवार की जिंदगी ज्यादा महत्पूर्ण है.
        सरकारी अस्पताल कहने भर को मुफ्त हैं.जनता के लिए उनका मिशन रोग मिटाओ कि जगह रोग बढाओ है.दवाएं आती हैं.कुछ बाज़ार में बिकने चली जाती हैं,कुछ डॉक्टरों के घर,निजी प्रेक्टिस में काम आती हैं.कुछ ऐसी तख्दीर वाले मरीज़ हैं जो अस्पताल आते हैं,वे डॉक्टरों कि फीस चुकाने की स्तिथि में हैं.वह जानकार हैं.अनुभवी हैं.डॉक्टर से पूछते हैं,''सर आपका क्लीनिक कहाँ है?''बस मामला फिट.उन्हें पता है.यह पब्लिक प्राइवेट इलाज निजी से सस्ता है और सरकारी से पूरी तरह बेहतर.
         यूँ अनाड़ी अज्ञानी किस्म के मरीजों की तादाद ज्यादा है.वे सरकारी पर्ची बनवाने के संघर्ष में सुबह से जुटते हैं.कतार में लगते हैं.जब तक नम्बर आता है डॉक्टर उठ जाता है.डॉक्टर भी तो इन्सान ही है.कब तक झंझटिया रोगियों के बीच बैठा रहे,थकान आती है.नई डाक्टरनी के साथ चाय पीनी है.पुराणी नर्स के साथ नाश्ता करना है.मरीजों का तांता तो अंतहीन है.उसे कभी कभी शक होता है वह कहता भी है.उसे लगता है कि हिंदुस्तान में लोग शादी करने और बीमार पड़ने के लिए ही पैदा होते हैं.जरूरी नहीं है कि क्रम यही रहे.क्रम बदल भी सकता है.पर बीमारी और विवाह का सिलसिला नहीं.उसके दुसरे साथी डॉक्टर भी उसकी इस अवधारणा से सहमत हैं.
             मजाक ये है कि हमने इस तरह के विज्ञापन टेलिविज़न पर देखे हैं पर किसी डॉक्टर का नहीं.यह डीमांड सप्लाई के नियम का उदाहरण है.मरीज़ अधिक हैं,डॉक्टर कम.उन्हें विज्ञापन कि दरकार क्यूँ हो?प्रतियोगिता वहाँ है,जहाँ पैसा है.जो गरीब बीमार हैं,उन्हें तो सरकारी अस्पताल जाना ही जाना है और जान भी गंवानी है.रेल के प्लेटफॉर्म और अस्पताल की भीड़ को देख कर ही स्पष्ट होता है कि भारत में आबादी का कैसा भयंकर विस्फोट है.
        विज्ञापन दर्शन में हमें ये भी ज्ञात हुआ कि कार स्कूटरों की कीमतों में इजाफा हुआ है.पड़ोसी सस्ते लोन और डिस्काउंट कि बात करते हैं.पर आम आदमी को डर लगा रहता है कि यदि लोन चूका नहीं पाया तो बड़ी भद होती है,इसलिए दूसरों कि देखा देखी ऐसी गलती करो ही क्यूँ?लेकिन इंसानों ने तो गजदंती संस्क्रती अपना ली है.सब इसी कोशिश में लगे हैं कि वह वैसे दिखें जैसे हैं नहीं.असलियत से सबको दिली परहेज़ है.इसी का नतीजा है कि चपरासी बाबु सा दिखता है और बाबू अफसर सा.
          मैंने एक बार घर के सामने वाले अंकल और उनके दोस्त की बाते सुनी.अंकल के दोस्त उन्हें बता रहे थे कि मोटर बाइक के साथ केलकुलेटर और कार के साथ उसका म्यूजिक सिस्टम फ्री है.अंकल ने सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए पूछा और स्कूटर के साथ?.........यानि महंगी चीज़ें बेचने कि ये अच्छी रणनीति है.मुख्य माल महंगा हो और उसके साथ कोई घटिया चीज़ फ्री.सरे विक्रेता भारतीय मानस की मुफ्तिया इंडिया प्रव्रत्ति से परिचित है.अगर किसी को फ्री में जूता भी मिले तो वह उसे खाने को तय्यार है.
            विज्ञापनों से ही मुझे पता लगा कि मोबाइल फ़ोन आजकल सस्ते है.डबल सिम वाले भी है.,टच से काम करने वाले भी.रेडियो,कैमरा,ईमेल क्या क्या फिट नहीं है.देश में संगीत का बड़ा शौक है.जो भी सड़क पर एक हाथ कान में अड़ाए दिखे तो ये निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि वह कान में मोबाइल फ़ोन लगाये गाने सुन रहा है.देश में बाज़ार का ये सराहनीये सांस्क्रतिक योगदान प्रशंसनिये है.
               मुझे ये भी मालूम हुआ है कि विज्ञापनदर्शन के लाभ ही लाभ है.मेरी तो सभी को एक ही सलाह है,दार्शनिक बताते हैं कि जीवन बस छाया है,क्यूँ है किसकी छाया है,किसलिए ऐसा है,कसे धंधे शोधार्थियों के लिए हैं.अगर हमें यही सब करना होता तो बाबू बनकर मक्खी मारने के बजाये,शोधार्थी बनकर उनका संहार करते.कैंची का प्रयोग करते,किताबों से उपयोगी अंश काटते जोड़ते.
            विज्ञापन यदि जीवन की छाया है,तो दूरदर्शन की स्क्रीन उसकी छाया है,और विज्ञापन छाया की छाया है.कवि ने कहा था ''छाया मत छूना मन,होगा दुःख दूना मन''.इसलिए हम छूते नहीं सिर्फ छाया देखते हैं.  
              जो भी हो विज्ञापन देखकर भी आजतक मुझे समझ नही आया कि एक खरीदो तो साथ में कुछ फ्री पाओ का जनउपयोगी उसूल,सब्जी आते पर क्यूँ नहीं लागू होता है?जसे किलो भर आलू पर एक अदद प्याज़ फ्री या फिर पांच किलो आटे के साथ एक कटोरी दाल मुफ्त जेसी पहल क्यूँ नही दिखती टेलिविज़न पर?मेरा ख्याल है कि ऐसा इसलिए मुमकिन नहीं है आटा दाल हीरे जवाहरात से ज्यादा कीमती है.कोई जिंदा रह पाए तभी तो सजेगा धजेगा,हीरे के साथ रत्ती भर सोना कहीं मुफ्त है क्या,तो आलू के साथ प्याज़ या फिर आटे कि खरीद में दाल फ्री कैसे हो?अपना सपना ऐसे ही टू इन वन का है देखती हूँ कभी सच होता है या नहीं...............

Sunday, 18 December 2011

SOOCHNA KA ADHIKAR...HAI KITNA SAFAL???

सूचना का अधिकार कानून लागू करने के पीछे मंशा सरकारी आधिकारियों व कर्मचारियों को जनता के प्रति ज़्यादा जवाबदेह बनने व भ्रष्टाचार को समाप्त करने की थी,लेकिन अब तक के अनुभवों से यही साबित होता है कि सूचना मांगने वालों को सरकारी प्रताड़ना से गुज़ारना पड़ता है और भ्रष्टाचार में कोई कमी नही आई है.  
                
     उत्तरी बिहार के बेगूसराए जिले के शशिधर मिश्रा कि 12 फरवरी 2010  की  शाम गोली मारकर हत्या कर दी गयी.32 वर्षीय शशिधर मिश्रा अपनी साइकिल से पास के गाँव में जाकर बिस्किट और चोकलेट बेचा करता था.उसके भाई महिंदर का आरोप है कि पुलिस तहकीकात जारी रखने में असफल रही है और इस हत्या कि गुत्थी सुलझने के भी कोई आसार नही हैं क्यूंकि गाँव के राजनीतिबाजों और प्रधान ने इस मामले में कोई रुचि नही दिखाई.
  घर के एक कमरे में छिपा कर रखे गये दर्जनों आर.टी.आई.आवेदनों कि तरफ इशारा कर महिंदर ने पुरे विश्वास के साथ बताया कि हो न हो उसके भाई कि हत्या कुछ समय पहले उसके द्वारा दर्ज सूचना के अधिकार के तहत कि गई शिकायतों के कारण हुई है.शशिधर हर रोज़ सुबह सुबह ज़िला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में सार्वजनिक सूचना काउंटर पर एक लिफाफा जमा करता था,जिनके द्वारा वह बार बार जिले के सरकारी आधिकारियों से सवाल पूछता था.अपने अंतिम आवेदन में उसने स्थानीय पुलिस को निशाना बनाया था.
   वर्ष 2005 में यू.पी.ए.सरकार ने प्रशासन को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना का अधिकार विधेयक पेश किया.जिसके तहत नागरिकों को स्थानीय और केंद्रीय आधिकारियों द्वारा रखे गये रिकार्डों और दस्तावेजों की जानकारी मांगने का अधिकार मिला.इस अधिकार के तहत आवेदक एक सरल फार्म के साथ अपने सवाल करके उससे सम्बंधित जानकारी हासिल कर सकता है.उधाहरण के लिए सरकार से साबित करने को कहा जा सकता है कि किसी जनकल्याणकारी योजना के तहत आवंटित कि गयी राशि सही तरीके से खर्च कि गयी है या नहीं,संबद्ध संस्था इसका जवाब देने के लिए कानून बाध्य है.
  2005 से पहले सरकारी दस्तावेज़ और रिकार्ड ब्रिटिश राज के बनाये हुए ऑफिशियल सेक्रेट एक्ट 1923 के तहत गोपनीय रखे जाते थे और रिश्वतखोरी या भाईभतीजावाद जैसी बुराई छिपाने में इस का अक्सर दरुपयोग किया जाता था.2004 के आम चुनावों में कांग्रेस ने आर.टी.आई. को एक महत्पूर्ण मुद्दा बनाया था.इस कानून के बनने के तुरंत बाद निचली श्रेणी और राष्ट्रीय स्तर के अधिकारीयों पर समान रूप से इसका असर देखा गया था.सूचना के अधिकार में आवेदन के जवाब में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने अपनी संपत्ति की घोषणा की थी.
   बेगुसराए के शशिधर मिश्र ने भी स्थानीय ठेकेदारों,ग्राम-प्रधानों,राजनीतिबाजों,सरकारी अधिकारीयों और पोलिसे सबको सवालों के दायरे में खड़ा किया था.उसके द्वारा दायर एक अपील के चलते ही बेगुसराए रेलवे स्टेशन पर अवैध रूप से निर्मित एक डेयरी स्टाल को हटाया गया था.शशिधर की हत्या के मामले में पुलिस ने घर की तलाशी और ज्यादातर आर.टी.आई. आवेदनों को कब्ज़े में कर लिया .
   सूचना का अधिकार लागू करने के अभियान में 1996 में चारा घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद तेज़ी आई और इसी साल के अंत में आंदोलनकर्ताओं, वकीलों,पत्रकारों और शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा नेशनल कैम्पेन फॉर पीपल्स राईट तो इन्फोर्मशन की स्थापना की गई और सूचना के अधिकार कानून का मसौदा तय्यार करके भारतीय जनता पार्टी सरकार के सामने पेश किया गया.इस प्रस्ताव पर 4 वर्ष तक कोई कार्यवाही नहीं हुई और अंतत; 2002 में एक बहुत सी मामूली से फ्रीडम ऑफ़ इन्फोर्मेशन एक्ट पर हस्ताक्षर किये गये,हलांकि एनसीपीआरई संगठन ने राजस्थान,तमिलनाडु,महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में राज्य  पर सूचना का अधिकार कानून लागू करवाने में सफलता पाई.
   2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने एक अधिक प्रगतिशील,सहभागी और सार्थक सूचना के अधिकार को लाने का वादा किया.कानून का मसौदा तय्यार करने के लिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में अरुणा राय को शामिल किया गया.गौरतलब है कि 90 के दशक की शुरुआत में राजस्थान में सूचना का अधिकार लागू करवाने में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरुणा राय की मुख्य भूमिका रही थी.
     कानून का मसौदा तय्यार हो जाने पर कानून मंत्रालय की ओर से काफी विरोध हुआ था और बिल के कई महत्वपूर्ण अंशों की कांट-छांट भी की गई.लोगों के द्वारा मांगी गई सूचनाओं को उपलब्ध न करने के दोषी अधिकारीयों को दंड देने का प्रावधान हटा दिया गया था,जिसपर अरुणा राय ने खासा हल्ला भी मचाया था.
   अंतत: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तछेप के बाद एक संसदीय समिति ने बिल का पुनरवलोकन करके 187 संशोधनों के साथ इसे संसद में फिर से पेश किया.15 मिनट की बहस के बाद एक सुधर को छोड़कर बाकि सरे सुधारों पर संसद में सहमती बनी.सूचना देने के लिए सूचना आयुक्त को मिली सिर्फ 30 दिन की समय सीमा को संसद सदस्यों ने नामंज़ूर कर दिया व अपीलों का जवाब देने के लिए बेमियादी समय देने का प्रावधान किया.अंतत: 12 अक्तूबर,2005 को ये कानून संसद में बड़ी धूमधाम से पारित हुआ.
        सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 5 वर्ष होने के बाद भी भ्रष्टाचार खतम होता नहीं दिखता.आर.टी.आई. आन्दोलन के मुख्य कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल का कहना है ''शुरुआत से ही इस कानून को कई विरोधों का सामना करना पड़ा है व सभी राजनीतिक दलों व अधिकारीयों ने इस कानून को कमज़ोर करने की कोशिश की क्यूंकि लोगों से सूचनाओं को छिपा रखने की ताखत वह गवाना नहीं चाहते थे.इस कानून को पास करके नेताओं ने अपने लिए ही कब्र खोद ली है,इस बात को वे समझ चुके हैं और अब इसका तोड़ ढूंडने लगे है.''केजरीवाल आयकर विभाग में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
       यक़ीनन इस कानून के तहत नागरिकों को अपनी अपनी सरकारों से जवाब तलब करने का अधिकार मिला है लेकिन दूसरी तरफ उनके निवेदनों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करने में ये कानून सफल नही है.ज़्यादातर सेवानिव्रत्त अधिकिरिओं को राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त का पद सौप दिया गया है पर वे निचली श्रेणी के भ्रष्ट अधिकारिओं को दण्डित करने से हिचकिचातें हैं.
      बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए आर.टी.आई. दायर करने वालो पर जान का खतरा भी मंडराता रहता है.महाराष्ट्र में कई भूमि घोटालों को उजागर करने वाले सतीश शेट्टी की जनवरी 2010 में पुणे में हत्या की गई तथा फिर उसी साल बिहार के शशिधर मिश्रा की हत्या भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं के सिर पर मंडराते खतरे का दूसरा उदहारण था.
   इसी के चलते केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री वीरप्पा मोइली ने सरकार की चुप्पी तोड़ी और मुखबिरों की पहचान को गुप्त रखने सम्बन्धी मसौदे को संसद के शीतकालीन सत्र में लाने का वादा किया,लेकिन संसद का शीतकालीन सत्र 2 जी स्पैक टर्म  घोटाले पर हुए हंगामे की भेंट चढ़ गया.देश के शीर्ष लोगों तक को झकझोर देने वाले इस घोटाले ने एक बार फिर से एक शक्तिशाली सूचना के अधिकार के कानून की आवश्यकता महसूस कराई है क्यूंकि मौजूदा कानून भ्रष्ट राजनीतिबाजों,उधोग पतिओं और अधिकारिओं की मिलीभगत तोड़ने में अशक्त ही जन पड़ता है.
    हलांकि कार्यकर्ताओं को इस कानून पर पूरा भरोसा है लेकिन इतना स्पष्ट है कि कानून बना देने मात्र से ही सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़तम नही किया जा सकता.सूचना आयुक्तों कि असमर्थता,अधिकारिओं कि टालमटोल की प्रवर्ती और सबसे महत्पूर्ण केंद्रीय सरकार के समर्थन और राजनीतिक इक्छाशक्ति का अभाव भी इस कानून के आड़े आता है.
     दूसरी बात ये है कि सूचना के अधिकार के कारण काम का बोझ बढने कि शिकायत भी सरकारी कर्मचारी करते हैं जो कि गलत है.ये दरअसल सरकारी महकमे की ही खामी है,सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा-4 में साफ़ लिखा है की हर जन प्राधिकरण के लिए ये जरूरी है कि उसके सारे रिकॉर्ड जनता के लिए सुलभ हों और वह इन्हें इन्टरनेट पर अपलोड करे ताकि विभाग का काम पारदर्शी हो और जनता को रिकॉर्ड पेश किये जाने के लिए कोई आर.टी.आई. डालने कि जरूरत ही न पड़े.लेकिन अधिनियम पारित होने के 5 साल बाद भी इसपर पूरी तरह अमल नहीं किया गया है.
        यहाँ तक कि सरकार भी इस अधिनियम के लिए सरकारी कर्मचारिओं में जागरूकता फैलाने व उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कोई खास कोशिश नहीं कर रही है.सरकार ने इस काम के लिए अरबों खरबों का बजट बनाया था,जिसमे से अब तक 6 करोड़ रुपए ही जनता व अधिकारीयों को जागरूक बनाने व प्रशिक्षित करने के लिए खर्च किये गये हैं.
   सेवानिव्रत्त व बूढ़े हो चुके राजनेता ही अब राज्यों के सूचना आयुक्तों का पद संभल कर बेठे है,हालाँकि इन कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नही है कि कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस पद पर आसीन नहीं हो सकता लेकिन आजतक ऐसे किसी व्यक्ति को यह पद नहीं सोंपा गया.यह इस कानून को कमज़ोर करने कि अधिकारिओं व भ्रष्ट नेताओं की मिलीभगत ही है.
       इस बारे में सवाल करने पर न तो किसी नेता के पास कोई तर्कसंगत जवाब होता है न ही अधिकारी के पास.कुल मिला कर इस अधिनियम की स्तिथि दयनीये है.यहाँ तक कि समय समय पर इसमें कुछ न कुछ ऐसे बदलाव करने की मांग भी उठती रही है जो राजनीतिबाजों के अपने हित में है.इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी अपनी निराशा ज़ाहिर कर चुकीं हैं.प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को लिखे अपने पत्र में उन्होंने साफ कहा है कि हमें सूचना का अधिकार कानून लागू करने के अपने मुख्य उद्देश से भटकना नहीं चाहए.इस पत्र में उन्होंने कार्यकर्ताओं को मिल रही धमकिओं व अत्याचारों पर भी चिंता ज़ाहिर कि है.
   लेकिन जो भी हो देश कि सबसे शक्तिशाली महिला की ये और चिंता समर्थन भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं को दिलासा दे पाने में नाकामयाब साबित हुआ है.
 

Saturday, 17 December 2011

bhartiye cinema ke sadabahar raj kapoor


भारतीय सिनेमा की एक अनमोल देन हैं राज कपूर..............
राजकपूर निर्माता,निर्देशक और अभिनेता के रूप में भारतीय सिनेमा जगत में पहचाने जाते रहेंगे.आज़ादी के बाद हिंदी सिनेमा में राजकपूर ही सबसे अधिक ताखत से कहते हैं कि''कलाकार किसी कि तरह बन सकता.वह कलाकार होता ही नही जो किसी कि तरह बनना चाहता है.उसे सिर्फ अपनी राह चलने कि जिद रही है.इसीलिए वह गिर गिर कर उठा और उठ उठ कर गिरा''
 राजकपूर का जन्म पेशावर(पाकिस्तान)में 14 दिसम्बर सन 1924 में हुआ था.राजकपूर के पिता अभिनेता पृथ्वी राजकपूर थे.राजकपूर के दो छोटे भाई अभिनेता शशि कपूर और शम्मी कपूर और एक बहन उर्मिला सेन थी.22 वर्ष की उम्र में राजकपूर का विवाह कृष्णा मल्होत्रा से हुआ.
  राजकपूर पहली बार सन 1935 में फिल्म इंकलाब में दिखाई दिए.बारह वर्षों तक बहुत सी फिल्मों में काम करने के बाद सन 1947 में नील कमल में मुख्य भूमिका की.24 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना स्टूडियो आर.के फिल्म्स बनाया और अपने वक़्त के सबसे कम उम्र के निर्देशक बन गये.उनकी पहली फिल्म बतौर निर्माता,निर्देशक और अभिनेता के रूप में आग (1948 )थी जिसको सफलता नही मिल सकी.आग की एक उपलब्धि थी राजकपूर की फिल्मों में नायिका के तौर पर नर्गिस का आगमन.1948 में राजकपूर और नर्गिस की जोड़ी जो बनी वहीं हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक और विलक्षण स्टार जोड़ी साबित हुई.राजकपूर ने 1948 से 1988 तक निर्देशक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बहुत सी फिल्मों से यादगार बन गये.उनमें बरसात (1949 )आवारा (1951 )श्री 420 (1955 ) और जिस देश में गंगा बहती है (1960 )हैं.1964 में निर्माता,निर्देशक के रूप में संगम प्रदर्शित हुई जो उनकी पहली रंगीन फिल्म थी.ये उनकी अभिनेता के रूप में आखिरी सबसे बड़ी सफलता थी.
                  1970 में मेरा नाम जोकर प्रदर्शित हुई जो असफल रही.इस फिल्म को बनाने में 6 वर्ष से अधिक समय लगा.यह फिल्म राजकपूर के जीवन का सपना थी.उनको इस असफलता से गहरा आघात लगा.इसके बाद उनकी फिल्म निर्माण दिशा में परिवर्तन आया.1973 में निर्माता,निर्देशक के रूप में बोबी फिल्म प्रदर्शित हुई.जिसने अपार सफलता अर्जित की.बोबी फिल्म से उनके पुत्र ऋषि कपूर और डिम्पल कपाडिया ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की.डिम्पल को इस फिल्म से काफी प्रसिद्धी मिली.ये फिल्म युवा पीढ़ी के रोमांस पर आधारित थी.डिम्पल की इस फिल्म में जो वेशभूषा थी वह उस वक़्त की भारतीय फिल्मों से अलग थी.राजकपूर ने फिर औरतों की भूमिकाओं को प्रधानता देकर सत्यम शिवम् सुन्दरम;1978 (जीनत अमान),प्रेमरोग 1982 ;(पदमिनी कोल्हापुरी),और राम तेरी गंगा मैली ;(मन्दाकिनी)फ़िल्में बनाई.राजकपूर की आखिरी सबसे बड़ी फिल्म जिसमें वह दिखे वकील बाबू (1982 )थी.
         राजकपूर अस्तमा के रोगी थे.1988 में अस्तमा के कारण उनका निधन हो गया.उस वक़्त वह 63 साल के थे.अपने देहांत से पहले वह हिना फिल्म पर काम कर रहे थे जो बाद में ऋषि कपूर ने पूरी की और ये 1991 में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर पार अपार सफलता मिली.
         फिल्म समीक्षक और साधारण फिल्म दर्शक सभी ने राजकपूर को खूब सराहा है.फिल्म इतिहासकार और फिल्मों के दीवाने सब उन्हें भारतीय फिल्म का चार्ली चैपलिन कहते हैं.उनकी प्रसिद्धी विश्व भर में है.अफ्रीका,मध्य-पूर्वी रूस(सोवियत संघ),चीन,दक्षिण-पूर्वी एशिया आदि हर जगह पर उनकी खूब प्रशंसा हुई.राजकपूर भारतीय सिनेमा के पथ प्रदर्शकों में से एक हैं.उनके अन्दर लोगों की दिलचस्पी को पहचानने और फिल्मों की गहरी समझ थी.आग,श्री 420 ,और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फिल्मों में देश भक्ति का सन्देश मिलता है.जिसने फिल्म निर्माताओं को देश भक्ति फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित किया.
      राजकपूर की फिल्मों में गीतों के चित्रांकन को देखना एक विशिष्ट अनुभव है.गानों को उन्होंने अपनी फिल्मों में फिलर के रूप में इस्तेमाल नही किया.उनकी फिल्मों के गीत फिल्मों की ताखत होते थे.राजकपूर की अधिकतर फिल्मों में मुख्यता संगीत निर्देशक शंकर जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी तथा शेलेन्द्र थे.निमी, डिम्पल कपाडिया,नर्गिस और मन्दाकिनी ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत राजकूपर की फिल्मों से ही की.राजकपूर ने पुत्रों ऋषि कपूर,रंधीर कपूर और राजीव कपूर का फ़िल्मी जीवन निखारने में पूरी तरह से मदद की.
                 राजकपूर को कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया.उन्हें 9  फिल्म फेयर अवार्ड और 19 नोमिनेशन मिले हैं.1971 में भारत सरकार ने उन्हें पदम् भूषण से सम्मानित किया.1987 में उन्हें सिनेमा जगत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला.2001 में उन्हें स्टार डस्ट अवार्ड द्वारा बेस्ट डिरेक्टर ऑफ़ मिलेनियम की उपाधि से नवाज़ा गया.2002 में उन्हें स्टार स्क्रीन अवार्ड में शो मैन ऑफ़ मिलेनियम की उपाधि दी गई.
  राजकपूर भारतीय सिनेमा के सदाबहार हीरो हैं..उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक नई पहचान दिलाई है..जिसे कभी नही भूला जा सकता.

Thursday, 15 December 2011

super bug ka havva.........


        दुनिया भर के लिए खतरा बनकर उभरे सुपरबग को भारत से जोड़ना या इसका नाम दिल्ली के नाम पर रखा जाना तर्कसंगत नहीं है.सुपरबग के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर हमले की साजिश रच रहे हैं. 
                       आखिर क्या है सुपरबग?
ये सवाल उठाना लाज़मी है कि आखिर क्या है ये सुपरबग.वास्तव में सुपरबग एक खास तरह के बैक्टीरिया को कहा गया है.ये बैक्टीरिया इसलिए सुपरबग कहलाता है क्यूंकि इस पर एंटीबायोटिक्स दवाओं का असर नही होता.इस तरह के बैक्टीरिया से निबटने के लिए जिन दवाओं से एंटीबायोटिक्स को तैयार किया गया है.ये बैक्टीरिया उन दवाओं में एंटीबायोटिक्स को खत्म करने की अपने अन्दर एक खास तरह कि ताखत विकसित कर लेते हैं.इससे वे दवाएं बेअसर हो जाती है.इसी कारण ये बैक्टीरिया सुपरबग कहलाते हैं.
   युद्ध केवल गोला बारूद से नही लड़ा जाता इसके और भी कई तरीके हैं.इन्ही तरीकों में से एक है आर्थिक हमला.इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी हमला चल रहा है.जिसक नाम है नई दिल्ली मेटालो-1 यानि नई दिल्ली नाम का एक सुपरबग.
गौरतलब है कि भारत में हेल्थ पर्यटन बड़े पैमाने पर सफल हो रहा है.आंकड़े बताते हैं कि भारत का हेल्थ पर्यटन महज़ 1 ,450 करोड़ रुपए का है.भारत के विभिन्न महानगरों में विकसित देशों से भी लोग इलाज करवाने आ रहे हैं.इसके पीछे वजह ये है कि विकसित देशों कि तुलना में भारत में इलाज का खर्च सस्ता है
              अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा कि सुविधा तो है लेकिन इसका लाभ सब नही उठा पाते.कहते है कि 4 करोड़ अमेरिकियों का बीमा नहीं है,क्यूंकि यहाँ प्रीमियम इतना ज्यादा है कि भारत आकर इलाज करवाना सस्ता पड़ता है.यही वजह है कि भारत में मेडिकल टूरिस्म तेज़ी से फलफूल रहा है.
                                          नई दिल्ली मेटाले-1 क्यूँ?
             ब्रिटिश वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक शोध में ये दावा किया गया है कि एक खास तरह का बेक्टीरिया जिस पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता है.भारतीय उपमहादीप से निकल कर तेज़ी से पूरी दुनिया में फैल रहा है.इसीलिए शोधकर्ताओं ने इस बेक्टीरिया का नाम न्यू दिल्ली मेटालो-बी-लेक्टामेस-1 दे दिया है.इस तरह के सुपरबग की भारत में भरमार है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के बग का पता पहली बार 2008 में चला था.भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो स्वीडन का प्रवासी था.भारत आया उसे डाई बिटीज़ थी.उसे एक घाव हुआ जो सूखने का नाम नही ले रहा था.
         2008 में वह भारत से स्वीडन लौटा और उसने घाव का इलाज करवाया.इलाज के दौरान कई टेस्ट करवाए गये.ब्रिटिश वैज्ञानिकों का दावा है कि इस बैक्टीरिया से उसे कोई नुकसान नहीं था और न ही उसकी किडनी में संक्रमण था.इसके बाद मरीज़ के डीएनए की जाँच की गई तो उसके शरीर में एक खास तरह के इंजाइम का पता चला.चूँकि मरीज़ भारतीय मूल का निवासी था और भारत से लौटकर वह घाव का इलाज करवाने आया था इसलिए इस बैक्टीरिया का नाम नई दिल्ली मेटालो रख दिया गया.
                                                  भारत में प्रतिक्रिया  
          जहाँ तक इस बैक्टीरिया के नामकरण का सवाल है तो इसे भारत की राजधानी नई दिल्ली से जोड़कर रखे जाने पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.हर तरफ से इसका विरोध किया गया है.भारत ने इसके नामकरण पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है.इतना ही नहीं,रिपोर्ट को भारत सरकार ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है.इंडियन काउन्सिल एंड मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ कम्युनिकेबल डिसीज़ ने इस तरह के प्रचार को भारतीय डाक्टरों और अस्पतालों के खिलाफ साजिश करार दिया है.
                                          खतरनाक तो अमेरिकी सुपरबग है.....
        कोलकाता मेडिकल कॉलेज के माइक्रो बायोलोजी विभाग के डॉ.रतन कुमार नाथ का मानना है कि यूरोप और अमेरिका में ऐसे सुपरबग जिनपर एंटीबायोटिक्स का असर नही होता इसकी समस्या कोई नई बात नहीं है,इस तरह के बहुत से सुपरबग पहले से ही विकसित देशों में पाए जाते हैं और ये तथाकथित एनडीएम्-1 कि तुलना में कही ज्यादा खतरनाक है.आंकड़े बताते है कि अमेरिका में सी डिफीसाईल नामक सुपरबग लम्बे समय से तांडव कर रहा है.अमेरिका के इस सुपरबग से संक्रमण का खतरा आम है.2005 के बाद एम्.आर.एस.ए.कि तुलना में सी डिफीसाईल से संक्रमण कि संख्या बढती जा रही है.इससे डाईरिया और बहुत सारे मामलों में आँतों कि सूजन कि बीमारी सामने आती है.इससे साफ़ है कि ये दोनों अमेरिकी सुपरबग बहुत ज्यादा खतरनाक हैं.
                                              संकीर्ण दायरे से उठाना जरूरी...
        जहाँ तक चर्चित सुपरबग एन.डी.एम्-1 का सवाल है तो इसके नामकरण पर आपत्ति जरुर कि जनि चाहिए.किसी भी ऐसे सुपरबग के लिए किसी देश पर ऊँगली उठाना गलत है.एड्स आज पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है.लेकिन इस बीमारी को अमेरिका या यूरोप के नाम के साथ नही जोड़ा जाता.जहाँ तक किसी भी सुपरबग के दुनिया भर में फैलने वाले खतरे का सवाल है तो उसको किसी देश या श्रेत्रसे न जोड़कर उससे कैसे निबटा जाये,इसपर विचार किया जाना चाहिये.
   एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल बहुत सोचविचार कर किया जाना चाहिए.एक समय के बाद बैक्टीरिया अपने भीतर भी एंटीबायोटिक्स से निबटने कि ताखत बढ़ा लेते हैं.ज़ाहिर है तब उनमे एंटीबायोटिक्स से निबटने कि ऊर्जा नही होती और ये स्तिथि खतरनाक हो जाती है.फिलहाल हर तरह के सुपरबग को चुनौती देने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एकजुट होकर काम करना चाहिए. न कि सीमित दायरे कि सोच लेकर किसी देश पर ऊँगली उठाई जाये.  
          

mass media in crisis

The role of mass media in crisis .......... Natural role of the mass media as a disaster when suddenly dancing orgy of mass destr...