हम अख़बार हो या दूरदर्शन,उसमे सिर्फ विज्ञापन देखते हैं.समाचार पत्र की खबरें और टेलीविज़न कार्यालय तो तकरीबन समान रूप से उबाऊ हैं.उनसे क्या उम्मीद रखना?वही प्रेम के ट्री एंगल धारावाहिक या फूहड़ कॉमेडी के नाम पर बनाये गये प्रतियोगी कार्यक्रम,बस एक ही राहत है.रिमोट नाम की सुविधा टेलिविज़न सेट के साथ उपलब्ध है.जब चाहा किसी भी चैनल से छुट्टी पा ली.विज्ञापन से अपना काफी ज्ञानवर्धन होता है.बाज़ार में क्या क्या उपभोगता पदार्थ उपलब्ध हैं?उनके साथ क्या क्या रियायतें हैं?इधर,शम्पू के सेशे घर में भरे पड़े हैं.पता लगा कभी कॉफ़ी,तो कभी बिस्कुट के साथ आ गये.कहावत है कि गंजे को ऊपर वाला नाखून नहीं देता है.हम गंजे भी हैं और नाखूनों से लैस भी.अपने पल्ले ये जरुर पड़ा है कि गंजे को आज का बाज़ार सैशे इफरात से देता है.
विज्ञापन को नियमित रूप से देखकर हमने यह भी सीखा है कि आजकल टू इन वन और थ्री इन वन का जमाना है.कई साबुन ऐसे हैं कि एक लो तो दूसरा फ्री मिलता है.कई 2 खरीदने पड़ते हैं,एक मुफ्त पाने को.मंजन का भी यही किस्सा है.हमें लगता है कि पूरा का पूरा बाज़ार उतारू है कि पूरा देश शैम्पू से सिर धोये,साबुन से मल मल कर नहाये और मंजन से जी भर कर दांत रगड़े.मतलब उपभोगता के सामान्य स्वास्थ्य का ध्यान बाज़ार पूरा निष्ठा से रखता है,ठीक वैसे ही जैसे सरकारी अस्पतालों के जरिये,सरकार देश कि जनता का रखती है.इन दोनों में से किसी के चंगुल में फसा दो तो आदमी की मुक्ति कठिन है.
हमें लगता है कि बाज़ार का प्रयास है कि ग्राहक उससे जुड़े.थोड़े दिन टू इन वन का आकर्षण उन्हें खींचता है,फिर एक ही ब्रांड के साबुन,पेस्ट या शैम्पू कि उपभोगता को आदत पड़ जाती है.बाज़ार को इसी मुबारक दिन का इंतजार रहता है.उसका मार्केटिंग प्रतिनिधि मन ही मन अपनी पीठ ठोकता है और बड़ बड़ाता है'' बच्चू ,अब बचके कहाँ जाओगे''.धीरे धीरे एक कि कीमत में मंजन,साबुन या पेस्ट इकलोते रह जाते हैं.कभी कभी उस अकेले कि भी कीमत बढ़ जाती है.
यही हाल सरकारी अस्पताल का भी है.एक बार जिस बीमार को वहाँ का चस्का लगा,वह ठीक होना तो दूर दिनोदिन और बीमार होता रहता है.आंख का ओपरेशन एक नही डॉक्टरों कि गलती से तीन बार करवाना पड़ता है.मगर वह बेचारा क्या करे इसके लिए कुछ हद तक उसकी आर्थिक बदहाली भी ज़िम्मेदार है.कहाँ से वह हर बार निजी अस्पताल या डाक्टरों कि हजारों रुपए कि फीस जुटाए और उन तक जाने कि हिम्मत करे.बात डॉक्टर तक ही सीमित नहीं है.उसकी लिखी दवा खरीदना कौनसा आसान है?उनका मूल्य भी कौनसा कम आसमानी है?आलम ये है कि जान जाये पर दवा न आये,एक सदस्य से पूरे परिवार की जिंदगी ज्यादा महत्पूर्ण है.
सरकारी अस्पताल कहने भर को मुफ्त हैं.जनता के लिए उनका मिशन रोग मिटाओ कि जगह रोग बढाओ है.दवाएं आती हैं.कुछ बाज़ार में बिकने चली जाती हैं,कुछ डॉक्टरों के घर,निजी प्रेक्टिस में काम आती हैं.कुछ ऐसी तख्दीर वाले मरीज़ हैं जो अस्पताल आते हैं,वे डॉक्टरों कि फीस चुकाने की स्तिथि में हैं.वह जानकार हैं.अनुभवी हैं.डॉक्टर से पूछते हैं,''सर आपका क्लीनिक कहाँ है?''बस मामला फिट.उन्हें पता है.यह पब्लिक प्राइवेट इलाज निजी से सस्ता है और सरकारी से पूरी तरह बेहतर.
यूँ अनाड़ी अज्ञानी किस्म के मरीजों की तादाद ज्यादा है.वे सरकारी पर्ची बनवाने के संघर्ष में सुबह से जुटते हैं.कतार में लगते हैं.जब तक नम्बर आता है डॉक्टर उठ जाता है.डॉक्टर भी तो इन्सान ही है.कब तक झंझटिया रोगियों के बीच बैठा रहे,थकान आती है.नई डाक्टरनी के साथ चाय पीनी है.पुराणी नर्स के साथ नाश्ता करना है.मरीजों का तांता तो अंतहीन है.उसे कभी कभी शक होता है वह कहता भी है.उसे लगता है कि हिंदुस्तान में लोग शादी करने और बीमार पड़ने के लिए ही पैदा होते हैं.जरूरी नहीं है कि क्रम यही रहे.क्रम बदल भी सकता है.पर बीमारी और विवाह का सिलसिला नहीं.उसके दुसरे साथी डॉक्टर भी उसकी इस अवधारणा से सहमत हैं.
मजाक ये है कि हमने इस तरह के विज्ञापन टेलिविज़न पर देखे हैं पर किसी डॉक्टर का नहीं.यह डीमांड सप्लाई के नियम का उदाहरण है.मरीज़ अधिक हैं,डॉक्टर कम.उन्हें विज्ञापन कि दरकार क्यूँ हो?प्रतियोगिता वहाँ है,जहाँ पैसा है.जो गरीब बीमार हैं,उन्हें तो सरकारी अस्पताल जाना ही जाना है और जान भी गंवानी है.रेल के प्लेटफॉर्म और अस्पताल की भीड़ को देख कर ही स्पष्ट होता है कि भारत में आबादी का कैसा भयंकर विस्फोट है.
विज्ञापन दर्शन में हमें ये भी ज्ञात हुआ कि कार स्कूटरों की कीमतों में इजाफा हुआ है.पड़ोसी सस्ते लोन और डिस्काउंट कि बात करते हैं.पर आम आदमी को डर लगा रहता है कि यदि लोन चूका नहीं पाया तो बड़ी भद होती है,इसलिए दूसरों कि देखा देखी ऐसी गलती करो ही क्यूँ?लेकिन इंसानों ने तो गजदंती संस्क्रती अपना ली है.सब इसी कोशिश में लगे हैं कि वह वैसे दिखें जैसे हैं नहीं.असलियत से सबको दिली परहेज़ है.इसी का नतीजा है कि चपरासी बाबु सा दिखता है और बाबू अफसर सा.
मैंने एक बार घर के सामने वाले अंकल और उनके दोस्त की बाते सुनी.अंकल के दोस्त उन्हें बता रहे थे कि मोटर बाइक के साथ केलकुलेटर और कार के साथ उसका म्यूजिक सिस्टम फ्री है.अंकल ने सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए पूछा और स्कूटर के साथ?.........यानि महंगी चीज़ें बेचने कि ये अच्छी रणनीति है.मुख्य माल महंगा हो और उसके साथ कोई घटिया चीज़ फ्री.सरे विक्रेता भारतीय मानस की मुफ्तिया इंडिया प्रव्रत्ति से परिचित है.अगर किसी को फ्री में जूता भी मिले तो वह उसे खाने को तय्यार है.
विज्ञापनों से ही मुझे पता लगा कि मोबाइल फ़ोन आजकल सस्ते है.डबल सिम वाले भी है.,टच से काम करने वाले भी.रेडियो,कैमरा,ईमेल क्या क्या फिट नहीं है.देश में संगीत का बड़ा शौक है.जो भी सड़क पर एक हाथ कान में अड़ाए दिखे तो ये निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि वह कान में मोबाइल फ़ोन लगाये गाने सुन रहा है.देश में बाज़ार का ये सराहनीये सांस्क्रतिक योगदान प्रशंसनिये है.
मुझे ये भी मालूम हुआ है कि विज्ञापनदर्शन के लाभ ही लाभ है.मेरी तो सभी को एक ही सलाह है,दार्शनिक बताते हैं कि जीवन बस छाया है,क्यूँ है किसकी छाया है,किसलिए ऐसा है,कसे धंधे शोधार्थियों के लिए हैं.अगर हमें यही सब करना होता तो बाबू बनकर मक्खी मारने के बजाये,शोधार्थी बनकर उनका संहार करते.कैंची का प्रयोग करते,किताबों से उपयोगी अंश काटते जोड़ते.
विज्ञापन यदि जीवन की छाया है,तो दूरदर्शन की स्क्रीन उसकी छाया है,और विज्ञापन छाया की छाया है.कवि ने कहा था ''छाया मत छूना मन,होगा दुःख दूना मन''.इसलिए हम छूते नहीं सिर्फ छाया देखते हैं.
जो भी हो विज्ञापन देखकर भी आजतक मुझे समझ नही आया कि एक खरीदो तो साथ में कुछ फ्री पाओ का जनउपयोगी उसूल,सब्जी आते पर क्यूँ नहीं लागू होता है?जसे किलो भर आलू पर एक अदद प्याज़ फ्री या फिर पांच किलो आटे के साथ एक कटोरी दाल मुफ्त जेसी पहल क्यूँ नही दिखती टेलिविज़न पर?मेरा ख्याल है कि ऐसा इसलिए मुमकिन नहीं है आटा दाल हीरे जवाहरात से ज्यादा कीमती है.कोई जिंदा रह पाए तभी तो सजेगा धजेगा,हीरे के साथ रत्ती भर सोना कहीं मुफ्त है क्या,तो आलू के साथ प्याज़ या फिर आटे कि खरीद में दाल फ्री कैसे हो?अपना सपना ऐसे ही टू इन वन का है देखती हूँ कभी सच होता है या नहीं...............
