Thursday, 22 December 2011

van raksha ki bhawna kyun padh rahi hai kamzoor?

वैसे तो पर्यावरण रक्षा में वनों की महत्वपूर्ण भूमिका को हमेशा स्वीकार किया गया है,लेकिन जलवायु बदलाव के बढ़ते खरते के मद्देनज़र कार्बन डाई ऑक साइड सोखने की अपनी भूमिका के कारण उनका महत्व और भी बढ़ गया है.चिंता की बात ये है की इसके बावजूद वनों के विनाश में कमी नहीं आई है.
अनुमान है कि पिछले एक दशक में ही पुरे विश्व के वन के इलाकों में लगभग चार लाख वर्ग किमी.की कमी आई है.विश्व स्तर पर ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे कुछ देशों में वनों का विनाश व्यापक चिंता का विषय बना है.जबकि कुछ विकसित देशों के बारे में माना जाता है कि उन्होंने इसकी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा लिए हैं.लेकिन अगर ये देखा जाये कि ये विकसित देश लकड़ी का बड़े पैमाने पर आयात कहाँ से करते हैं तो स्पष्ट हो जायेगा कि गरीब देशों में वनों का विनाश इन विकसित देशों की मांग की आपूर्ति के लिए ही हो रहा है.
          
        भारत जैसे विकासशील देशों के बारे में प्राय: यह माना जाता है कि यहाँ के वन व पर्यावरण विभाग काफी सक्रिय हैं और यहाँ जंगलों की स्तिथि कुल मिलाकर ठीक ठाक है.सरकारी आंकड़े भी यही बताते हैं.अगर इन्हें सच माना जाए तो भारत के वन आच्छादित इलाकों में वर्ष 1997 -2007 के बीच 0 .5 प्रतिशत हर साल की बढ़ोतरी है.मगर आज़ाद शोधकर्ता इन सकारी आंकड़ों को चुनौती देते रहे हैं.इस चुनौती क मुख्य आधार ये रहा है कि सरकारी आंकड़ों में वनों को बहुत दबे दायरे के तौर पर परिभाषित किया जाता है.
                    जहाँ थोड़े से पेड़ हैं या जहाँ प्राक्रतिक वनों को खत्म करने के बाद व्यापारिक महत्व के विदेशी प्रजाति के पेड़ लगाये गये हैं उन्हें भी वन के इलाके के रूप में गिन लिया जाता है.क्या ये सही है?प्राक्रतिक वनों में मिश्रित प्रजातियों के पेड़ घने रूप में होते हैं व इनके निचे तरह तरह के छोटे पेड़-पौधे,झाड़ियाँ व घास खूब पनपते हैं.इस माहौल में बहुत तरह के पशु पक्षियों,कीट पतंगो को अनुकूल वातावरण मिलता है.इन पेड़ पौधों के नीचे की मिटटी बहुत उपजाऊ व सजीव होती है,जिसमे लाखों तरह के सूक्ष्म जीव पनपते हैं.इन मिश्रित प्राक्रतिक वनों में जैव विविधता संजोने और कार्बन डाई ऑक साइड सोखने की अदभुत ताखत होती है.इन जंगलों में बाढ़ को रोकने और विभिन्न प्रकार के पोष्टिक खाद व जड़ी बूटियां देने की पर्याप्त ताखत होती हैं.
जल-संरक्षण में इनका काफी योगदान होता है.दूसरी ओर व्यापारिक प्रजातियों के मोनोकल्चर या मुख्य रूप से एक ही पेड़ के बड़े इलाके में किये गये प्लान्टेशन प्राक्रतिक वनों जैसी बहुपक्षीय भूमिका निभाने में नाकामयाब होते हैं.
                       विदेशी प्रजातियों के मोनोकल्चर तो और भी हानिकारक सिद्ध हुए हैं,क्यूंकि वे किसी अन्य स्तिथि के लिए उपयोगी थे,यहाँ उन्हें ज़बरदस्ती प्रवेश दिला दिया गया है.यूकेलिप्ट्स के प्लान्टेशन अपनी जल सोखने की ताखत के लिए जाने जाते थे,पर उन्हें ऐसे इलाखों में भी लगा दिया गया जहाँ पानी का संकट है.इस तरह जल संरक्षण करने की जगह उनकी भूमिका जल-संकट बढाने की हो गई.वैसे भी प्लान्टेशन का मुख्य मकसद तेज़ी से बढ़ने वाले पेड़ लगा कर उन्हें एक निश्चित अवधि में काटना होता है.अत: प्लान्टेशन को स्थायी हरियाली नहीं मान सकते.इसलिए वन आच्छादित इलाके के सही अनुमान लगाने के लिए इस तरह के प्लान्टेशन को उसमे शामिल नहीं करना चाहिए.अगर इन प्लान्टेशन इलाकों को हटाकर उपलब्ध आंकड़ों का आकलन किया जाये तो पता चलता है कि भारत के प्राक्रतिक वन हर साल लगभग 2 . 1 हर साल कि दर से कम हो रहे हैं.इसलिए ये बहुत जरूरी है कि वनों की वास्तविक स्तिथि की समझ देश में बनाई जाये और उनके अनुकूल जरूरी कदम उठाये जाये.

                        इसके लिए वन विभागों व अधिकारीयों के नज़रिओं में भी बदलाव करने की जरूरत है.हमारी वन नीति के एक और पक्ष पर गौर करने की जरूरत है.हिमालय के सन्दर्भ में कभी गांधीजी की शिष्या मीरा बहन ने वन अधिकारिओं से एक महत्वपूर्ण बहस चलाई कि किस तरह चीड़ जैसे शंकुधारी पेड़ों को महत्व देने से चौड़ी पत्ति वाले बांज जैसे पेड़ हाशिये पर चले गये.चीड़ से लुगदी और लीसा मिलता था,इसलिए इसका व्यापारिक महत्व बढ़ गया.लेकिन गाँव वासिओं के पशुपालन,जल व मिटटी संरक्षण की द्रष्टि से बांज जैसे चौड़ी पत्ति के पेड़ ही अधिक उपयोगी थे.इस तरह वनों का चरित्र बदलने से गाँव वासिओं ने वनों के संबंध में भी बदलाव आने लगा और उनके मन से अपने वनों की रक्षा की भावना कमज़ोर होने लगी.इसलिए जब वनों की रक्षा की बात की जाती है तो मिश्रित प्राक्रतिक वनों की रक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए.आज ज़्यादातर घने प्राक्रतिक वन आदिवासी बहुल इलाकों में ही बचें हैं.उन्होंने हजारों सालों तक इन वनों का उपयोग अपनी जीवन शैली के अनुकूल किया और वे नष्ट नहीं हुए.पर अब कोई एक खनन परियोजना एक ही झटके में पूरा वन उजाड़ देती है.चिपको आन्दोलन के दौरान २०० से ३०० पेड़ों के कटान को रोकने के लिए भी आन्दोलन होता था.चर्चा होती थी,पर अब कई परियोजनाओं के लिए एक लाख या उससे भी ज्यादा पेड़ कट जाते हैं और उस इलाके के बाहर किसी को खबर भी नहीं होती.
                        जिन वन इलाकों की कटाई पहले वर्जित मानी गई थी,आज वहां भी इसकी मंज़ूरी दी जा रही है.जहाँ खनन जैसे काम प्रतिबंधित थे,वहां से भी प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं.इन प्रव्रत्तियों के पीछे मूल बात यही है की पर्यावरण पर पैसा और संरक्षण पर सौदेबाजी हावी है.लेकिन वनों के बहु पक्षीय महत्व को रेखांकित करते हुए हमें वन विनाश पर रोक लगानी ही होगी....
 

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