Thursday, 17 May 2012

                      अंधेरों से भरा जीवन:- बाल मजदूर जीवन 

                कहते हैं सच्चाई की हमेशा जीत होती है।लेकिन कभी कभी कुछ सच हारने भी चाहिये.जैसे हमारे देश का एक सच बाल मजदूरी।इसे हराने में मदद कीजिये और ये भी नही कर सकते तो कम से कम इसे बढ़ावा तो मत दीजिये।
                               राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एन सी पी सी आर) ने घरों में बढती बाल मजदूरी की
तरफ इशारा करते हुए घरेलू काम काज को भी श्रम काम काज में लाने की बात कही है।क्यूंकि लगातार देश में बाल मजदूरों की संख्या में बढोतरी आंकी गई है।एक अनुमान के मुताबिक देश में इस वक़्त 1.3 करोड़ बाल मजदूर हैं।जिनमे से ज़्यादातर घरों में काम करते हैं।
                 लेकिन घरेलू काम काज बाल श्रम कानूनों के तहत नहीं आते हैं जो की चिंता का विषय है।बाल मजदूरी के ज़्यादातर विषय सामने इसलिए भी नहीं आ पाते  क्यूंकि 
घरों में काम करने वाले बच्चो को बाल मजदूर माना ही नही जाता। हम खुद ये मानने लगते हैं क हमारे घर में काम करने वाला बच्चा बाल मजदूर नहीं है।बाल मजदूर तो बहार ईटें उठता 
या खतरनाक फेक्टरियों में काम करता है।हम ये क्यूँ नहीं सोचते के हमारे घर में बर्तन धोने वाला बच्चा भी बाल मजदूर है।
                 इसके अलावा बाल मजदूरी शिक्षा के अधिकार का भी उलघ्घन करती है।शिक्षा के अधिकार के तहत कोई भी 14 साल से कम उम्र का बच्चा कही भी काम नहीं कर सकता चाहे वो कोई ढाबा हो,फेक्टरी हो या फिर हमारा आपका घर।
              बाल मजदूरी जैसे पाप को बढ़ावा न दे बल्कि इसे खतम करने में मदद करें।ये मदद पैसे से ज़रूरी नही।बल्कि एक रोक से संभव है.रोक अपने घर से शुरू हो सकती है।ताकि इन मासूम बच्चो का जीवन अन्धेरें में न चला जाये।

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