Tuesday, 22 November 2011

matr divas

8 मई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माँ दिवस के रूप में मनाने का चलन चल पड़ा है.उसके बावजूद इस दिवस पर माँ एवं संतान के बीच  कैसा प्राक्रतिक एवं मानसिक रिश्ता होता है,उसके बारे में बहुत कम चर्चा होती है.
        पिंडज रूप में उत्पन्न होने वाले जीव में पिता की सहभागिता को नकारा नहीं जा सकता पर हर पिंडज जीव की माँ प्राक्रतिक नियम के अनुसार अपनी संतान को गर्भ में पालती है.जो वह खाती है,गर्भनाल द्वारा उसके गर्भ में पलने वाली उसकी संतान को मिलता है.गर्भ में पल रहे बच्चे का स्वास्थ माँ  के स्वास्थ पर निर्भर करता  है.अंडज वाले जीव पर भी यही नियम लागू होता है.
                  मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है फिर भी अपनी पत्नी के गर्भ में पलने वाली अपनी संतान की पल-पल की हलचल को वह सीधी तौर महसूस नही कर सकता है यही कारण है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों का पूरी तरह से निर्वहन करने के बावजूद कम उम्र में संतान का अपनी माँ के प्रति और माँ का आजीवन संतान के प्रति बेहद लगाव होता है.किसी किसी तरह के कामों में उलझी माँ अपने नवजात कि दर्द भरी आवाज़ सुनकर इतनी बैचेन हो जाती है कि जिस रूप में होती है दौड़ती हुई वहां पहुचने कि कोशिश करती है.इससे पिता कि महत्ता कम नहीं होती पर तुलनात्मक स्तर पर माँ का स्थान पिता कभी नहीं ले सकता है.किसी कारण वश पिता के न रहने पर अशिक्षित माँ भी चार पांच बच्चों को पाल लेती है.सांसारिक विवशता में उलझने के कारण कोई और रास्ता न दिखाई दे तो अपने तन का सौदा करने को तय्यार हो जाती है पर बच्चे को भूख से मरने नही देती.
सभी धर्मों में माँ का बड़ा ऊँचा स्थान दिया गया है.इस्लाम में कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है.ईसाई धर्म में भी माँ बहुत ऊँचा स्थान है.सनातन धर्म में भी माँ का स्थान पिता कि अपेक्षा ऊँचा है.
विश्व माड;मय में सिर्फ जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम ही ऐसे महापुरुष थे जो पिता कि आज्ञा पाने पर माँ का सर धड़ से अलग कर लाये थे.पर पिता के प्रसन्न होने पर आशीर्वचन मांगने के आदेश पर उन्होंने पिता से माँ को पुन: जिंदा करने की प्रार्थना की थी और माँ जिंदा हो गई थी.इसे जिस रूप में लें पर यह भी माँ कि महत्ता उजागर होती है.
आज हम भले ही माँ दिवस मना लें पर हमारी शिक्षा का स्तर नैतिकता से इतनी दूर चला गया है कि माँ के ममत्व को नज़र अंदाज़ कर अपने सुख को सिर्फ अपनी जवान पत्नी और बच्चों तक ही सीमित कर लिया है.हम बड़ा से बड़ा सुख पाना चाहते है पर उसमें बूढी माँ का स्थान नहीं होता.माँ को अपने घर में किसी कोने में पड़े रहने को विवश कर देते हैं या वर्धाश्रम में पंहुचा देते है.ये कभी नहीं सोचते कि कैसे माँ ने अपने शारीरिक सुखों में कटौती करके हमें पाला पोसा एवं इस कदर आगे बढ़ाया है.हम सारी उपलब्धियों को निजी उपलब्धि मानते हैं जबकि व्यक्ति को माँ का सहयोग न मिले तो उससे एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल है.जीवन की मौलिक आवश्यकताओं को भी आदमी अकेले पैदा नहीं कर सकता.
         आज हम पैसों को ही सर्वोपरी मान बैठें हैं,जबकि जीवन में मिलने वाली साडी उपलब्धियों का मूलभाव है सुख अर्जित करना पर उस सुख का क्या फायदा?जो बूढी माँ को वर्धाश्रम में,फुटपाथों पर,दूसरों के रहमोंकरम पर जिंदगी गुज़ारने पर विवश कर दें.ये सुख तो ऐसा है जैसे जानवर को वध करते हुए कसाई पाता है.
   माँ जन्म से ही ये मान चलती है की लड़की अपनी ससुराल चली जाएगी लेकिन उसका बेटा बुढ़ापे में उसकी देखभाल वैसे ही करेगा जैसे बचपन में वह उसकी करती थी.बुढ़ापे में सारे शरीर के अंग शिथित हो जाते हैं.इसमें कुछ माएं अर्द्ध विक्षिप्त हो जाती हैं.अपने बच्चों को भी पहचान नही पाती हैं.अपने बेटे से ही कहती हैं मेरे बेटे को बुला दो,ऐसी स्थिति में अपने शारीरिक सुख के लिए माँ को अपने रिश्तेदारों के पास ये ऐसी जगह पर छोड़ देना क्या उचित होगा?जहाँ वह किसी से कुछ अधिकार पूर्ण नहीं कह सकती.
         माँ अपने बच्चे से प्यार करती है.इसे सर्वव्यापी वाक्य माना गया है.इसका अपवाद हो सकता है पर इस अपवाद के आधार पर सभी माँ को दोषी नही ठहराया जा सकता है.यदि स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में माता-पिता,गुरु,वर्धजनों आदि के प्रति सम्मान सेवा करने वाली शिक्षा अनिवार्य कर दी जाये तो हम नारी को भोग विषय वासना तक ही सीमित करके नहीं आकेंगे.उम्र समय और रिश्ते के आधार पर उनके प्रति हमारे सम्मान सूचक व्यवहार स्वत: जुड़ जायेंगे.फिर साल में एक दिन माँ दिवस मनाने की औपचारिकता का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा.

mass media in crisis

The role of mass media in crisis .......... Natural role of the mass media as a disaster when suddenly dancing orgy of mass destr...