सूचना का अधिकार कानून लागू करने के पीछे मंशा सरकारी आधिकारियों व कर्मचारियों को जनता के प्रति ज़्यादा जवाबदेह बनने व भ्रष्टाचार को समाप्त करने की थी,लेकिन अब तक के अनुभवों से यही साबित होता है कि सूचना मांगने वालों को सरकारी प्रताड़ना से गुज़ारना पड़ता है और भ्रष्टाचार में कोई कमी नही आई है.
उत्तरी बिहार के बेगूसराए जिले के शशिधर मिश्रा कि 12 फरवरी 2010 की शाम गोली मारकर हत्या कर दी गयी.32 वर्षीय शशिधर मिश्रा अपनी साइकिल से पास के गाँव में जाकर बिस्किट और चोकलेट बेचा करता था.उसके भाई महिंदर का आरोप है कि पुलिस तहकीकात जारी रखने में असफल रही है और इस हत्या कि गुत्थी सुलझने के भी कोई आसार नही हैं क्यूंकि गाँव के राजनीतिबाजों और प्रधान ने इस मामले में कोई रुचि नही दिखाई.
घर के एक कमरे में छिपा कर रखे गये दर्जनों आर.टी.आई.आवेदनों कि तरफ इशारा कर महिंदर ने पुरे विश्वास के साथ बताया कि हो न हो उसके भाई कि हत्या कुछ समय पहले उसके द्वारा दर्ज सूचना के अधिकार के तहत कि गई शिकायतों के कारण हुई है.शशिधर हर रोज़ सुबह सुबह ज़िला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में सार्वजनिक सूचना काउंटर पर एक लिफाफा जमा करता था,जिनके द्वारा वह बार बार जिले के सरकारी आधिकारियों से सवाल पूछता था.अपने अंतिम आवेदन में उसने स्थानीय पुलिस को निशाना बनाया था.
वर्ष 2005 में यू.पी.ए.सरकार ने प्रशासन को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना का अधिकार विधेयक पेश किया.जिसके तहत नागरिकों को स्थानीय और केंद्रीय आधिकारियों द्वारा रखे गये रिकार्डों और दस्तावेजों की जानकारी मांगने का अधिकार मिला.इस अधिकार के तहत आवेदक एक सरल फार्म के साथ अपने सवाल करके उससे सम्बंधित जानकारी हासिल कर सकता है.उधाहरण के लिए सरकार से साबित करने को कहा जा सकता है कि किसी जनकल्याणकारी योजना के तहत आवंटित कि गयी राशि सही तरीके से खर्च कि गयी है या नहीं,संबद्ध संस्था इसका जवाब देने के लिए कानून बाध्य है.
2005 से पहले सरकारी दस्तावेज़ और रिकार्ड ब्रिटिश राज के बनाये हुए ऑफिशियल सेक्रेट एक्ट 1923 के तहत गोपनीय रखे जाते थे और रिश्वतखोरी या भाईभतीजावाद जैसी बुराई छिपाने में इस का अक्सर दरुपयोग किया जाता था.2004 के आम चुनावों में कांग्रेस ने आर.टी.आई. को एक महत्पूर्ण मुद्दा बनाया था.इस कानून के बनने के तुरंत बाद निचली श्रेणी और राष्ट्रीय स्तर के अधिकारीयों पर समान रूप से इसका असर देखा गया था.सूचना के अधिकार में आवेदन के जवाब में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने अपनी संपत्ति की घोषणा की थी.
बेगुसराए के शशिधर मिश्र ने भी स्थानीय ठेकेदारों,ग्राम-प्रधानों,राजनीतिबाजों,सरकारी अधिकारीयों और पोलिसे सबको सवालों के दायरे में खड़ा किया था.उसके द्वारा दायर एक अपील के चलते ही बेगुसराए रेलवे स्टेशन पर अवैध रूप से निर्मित एक डेयरी स्टाल को हटाया गया था.शशिधर की हत्या के मामले में पुलिस ने घर की तलाशी और ज्यादातर आर.टी.आई. आवेदनों को कब्ज़े में कर लिया .
सूचना का अधिकार लागू करने के अभियान में 1996 में चारा घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद तेज़ी आई और इसी साल के अंत में आंदोलनकर्ताओं, वकीलों,पत्रकारों और शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा नेशनल कैम्पेन फॉर पीपल्स राईट तो इन्फोर्मशन की स्थापना की गई और सूचना के अधिकार कानून का मसौदा तय्यार करके भारतीय जनता पार्टी सरकार के सामने पेश किया गया.इस प्रस्ताव पर 4 वर्ष तक कोई कार्यवाही नहीं हुई और अंतत; 2002 में एक बहुत सी मामूली से फ्रीडम ऑफ़ इन्फोर्मेशन एक्ट पर हस्ताक्षर किये गये,हलांकि एनसीपीआरई संगठन ने राजस्थान,तमिलनाडु,महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में राज्य पर सूचना का अधिकार कानून लागू करवाने में सफलता पाई.
2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने एक अधिक प्रगतिशील,सहभागी और सार्थक सूचना के अधिकार को लाने का वादा किया.कानून का मसौदा तय्यार करने के लिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में अरुणा राय को शामिल किया गया.गौरतलब है कि 90 के दशक की शुरुआत में राजस्थान में सूचना का अधिकार लागू करवाने में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरुणा राय की मुख्य भूमिका रही थी.
कानून का मसौदा तय्यार हो जाने पर कानून मंत्रालय की ओर से काफी विरोध हुआ था और बिल के कई महत्वपूर्ण अंशों की कांट-छांट भी की गई.लोगों के द्वारा मांगी गई सूचनाओं को उपलब्ध न करने के दोषी अधिकारीयों को दंड देने का प्रावधान हटा दिया गया था,जिसपर अरुणा राय ने खासा हल्ला भी मचाया था.
अंतत: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तछेप के बाद एक संसदीय समिति ने बिल का पुनरवलोकन करके 187 संशोधनों के साथ इसे संसद में फिर से पेश किया.15 मिनट की बहस के बाद एक सुधर को छोड़कर बाकि सरे सुधारों पर संसद में सहमती बनी.सूचना देने के लिए सूचना आयुक्त को मिली सिर्फ 30 दिन की समय सीमा को संसद सदस्यों ने नामंज़ूर कर दिया व अपीलों का जवाब देने के लिए बेमियादी समय देने का प्रावधान किया.अंतत: 12 अक्तूबर,2005 को ये कानून संसद में बड़ी धूमधाम से पारित हुआ.
सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 5 वर्ष होने के बाद भी भ्रष्टाचार खतम होता नहीं दिखता.आर.टी.आई. आन्दोलन के मुख्य कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल का कहना है ''शुरुआत से ही इस कानून को कई विरोधों का सामना करना पड़ा है व सभी राजनीतिक दलों व अधिकारीयों ने इस कानून को कमज़ोर करने की कोशिश की क्यूंकि लोगों से सूचनाओं को छिपा रखने की ताखत वह गवाना नहीं चाहते थे.इस कानून को पास करके नेताओं ने अपने लिए ही कब्र खोद ली है,इस बात को वे समझ चुके हैं और अब इसका तोड़ ढूंडने लगे है.''केजरीवाल आयकर विभाग में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
यक़ीनन इस कानून के तहत नागरिकों को अपनी अपनी सरकारों से जवाब तलब करने का अधिकार मिला है लेकिन दूसरी तरफ उनके निवेदनों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करने में ये कानून सफल नही है.ज़्यादातर सेवानिव्रत्त अधिकिरिओं को राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त का पद सौप दिया गया है पर वे निचली श्रेणी के भ्रष्ट अधिकारिओं को दण्डित करने से हिचकिचातें हैं.
बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए आर.टी.आई. दायर करने वालो पर जान का खतरा भी मंडराता रहता है.महाराष्ट्र में कई भूमि घोटालों को उजागर करने वाले सतीश शेट्टी की जनवरी 2010 में पुणे में हत्या की गई तथा फिर उसी साल बिहार के शशिधर मिश्रा की हत्या भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं के सिर पर मंडराते खतरे का दूसरा उदहारण था.
इसी के चलते केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री वीरप्पा मोइली ने सरकार की चुप्पी तोड़ी और मुखबिरों की पहचान को गुप्त रखने सम्बन्धी मसौदे को संसद के शीतकालीन सत्र में लाने का वादा किया,लेकिन संसद का शीतकालीन सत्र 2 जी स्पैक टर्म घोटाले पर हुए हंगामे की भेंट चढ़ गया.देश के शीर्ष लोगों तक को झकझोर देने वाले इस घोटाले ने एक बार फिर से एक शक्तिशाली सूचना के अधिकार के कानून की आवश्यकता महसूस कराई है क्यूंकि मौजूदा कानून भ्रष्ट राजनीतिबाजों,उधोग पतिओं और अधिकारिओं की मिलीभगत तोड़ने में अशक्त ही जन पड़ता है.
हलांकि कार्यकर्ताओं को इस कानून पर पूरा भरोसा है लेकिन इतना स्पष्ट है कि कानून बना देने मात्र से ही सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़तम नही किया जा सकता.सूचना आयुक्तों कि असमर्थता,अधिकारिओं कि टालमटोल की प्रवर्ती और सबसे महत्पूर्ण केंद्रीय सरकार के समर्थन और राजनीतिक इक्छाशक्ति का अभाव भी इस कानून के आड़े आता है.
दूसरी बात ये है कि सूचना के अधिकार के कारण काम का बोझ बढने कि शिकायत भी सरकारी कर्मचारी करते हैं जो कि गलत है.ये दरअसल सरकारी महकमे की ही खामी है,सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा-4 में साफ़ लिखा है की हर जन प्राधिकरण के लिए ये जरूरी है कि उसके सारे रिकॉर्ड जनता के लिए सुलभ हों और वह इन्हें इन्टरनेट पर अपलोड करे ताकि विभाग का काम पारदर्शी हो और जनता को रिकॉर्ड पेश किये जाने के लिए कोई आर.टी.आई. डालने कि जरूरत ही न पड़े.लेकिन अधिनियम पारित होने के 5 साल बाद भी इसपर पूरी तरह अमल नहीं किया गया है.
यहाँ तक कि सरकार भी इस अधिनियम के लिए सरकारी कर्मचारिओं में जागरूकता फैलाने व उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कोई खास कोशिश नहीं कर रही है.सरकार ने इस काम के लिए अरबों खरबों का बजट बनाया था,जिसमे से अब तक 6 करोड़ रुपए ही जनता व अधिकारीयों को जागरूक बनाने व प्रशिक्षित करने के लिए खर्च किये गये हैं.
सेवानिव्रत्त व बूढ़े हो चुके राजनेता ही अब राज्यों के सूचना आयुक्तों का पद संभल कर बेठे है,हालाँकि इन कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नही है कि कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस पद पर आसीन नहीं हो सकता लेकिन आजतक ऐसे किसी व्यक्ति को यह पद नहीं सोंपा गया.यह इस कानून को कमज़ोर करने कि अधिकारिओं व भ्रष्ट नेताओं की मिलीभगत ही है.
इस बारे में सवाल करने पर न तो किसी नेता के पास कोई तर्कसंगत जवाब होता है न ही अधिकारी के पास.कुल मिला कर इस अधिनियम की स्तिथि दयनीये है.यहाँ तक कि समय समय पर इसमें कुछ न कुछ ऐसे बदलाव करने की मांग भी उठती रही है जो राजनीतिबाजों के अपने हित में है.इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी अपनी निराशा ज़ाहिर कर चुकीं हैं.प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को लिखे अपने पत्र में उन्होंने साफ कहा है कि हमें सूचना का अधिकार कानून लागू करने के अपने मुख्य उद्देश से भटकना नहीं चाहए.इस पत्र में उन्होंने कार्यकर्ताओं को मिल रही धमकिओं व अत्याचारों पर भी चिंता ज़ाहिर कि है.
लेकिन जो भी हो देश कि सबसे शक्तिशाली महिला की ये और चिंता समर्थन भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं को दिलासा दे पाने में नाकामयाब साबित हुआ है.
उत्तरी बिहार के बेगूसराए जिले के शशिधर मिश्रा कि 12 फरवरी 2010 की शाम गोली मारकर हत्या कर दी गयी.32 वर्षीय शशिधर मिश्रा अपनी साइकिल से पास के गाँव में जाकर बिस्किट और चोकलेट बेचा करता था.उसके भाई महिंदर का आरोप है कि पुलिस तहकीकात जारी रखने में असफल रही है और इस हत्या कि गुत्थी सुलझने के भी कोई आसार नही हैं क्यूंकि गाँव के राजनीतिबाजों और प्रधान ने इस मामले में कोई रुचि नही दिखाई.
घर के एक कमरे में छिपा कर रखे गये दर्जनों आर.टी.आई.आवेदनों कि तरफ इशारा कर महिंदर ने पुरे विश्वास के साथ बताया कि हो न हो उसके भाई कि हत्या कुछ समय पहले उसके द्वारा दर्ज सूचना के अधिकार के तहत कि गई शिकायतों के कारण हुई है.शशिधर हर रोज़ सुबह सुबह ज़िला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में सार्वजनिक सूचना काउंटर पर एक लिफाफा जमा करता था,जिनके द्वारा वह बार बार जिले के सरकारी आधिकारियों से सवाल पूछता था.अपने अंतिम आवेदन में उसने स्थानीय पुलिस को निशाना बनाया था.
वर्ष 2005 में यू.पी.ए.सरकार ने प्रशासन को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना का अधिकार विधेयक पेश किया.जिसके तहत नागरिकों को स्थानीय और केंद्रीय आधिकारियों द्वारा रखे गये रिकार्डों और दस्तावेजों की जानकारी मांगने का अधिकार मिला.इस अधिकार के तहत आवेदक एक सरल फार्म के साथ अपने सवाल करके उससे सम्बंधित जानकारी हासिल कर सकता है.उधाहरण के लिए सरकार से साबित करने को कहा जा सकता है कि किसी जनकल्याणकारी योजना के तहत आवंटित कि गयी राशि सही तरीके से खर्च कि गयी है या नहीं,संबद्ध संस्था इसका जवाब देने के लिए कानून बाध्य है.
2005 से पहले सरकारी दस्तावेज़ और रिकार्ड ब्रिटिश राज के बनाये हुए ऑफिशियल सेक्रेट एक्ट 1923 के तहत गोपनीय रखे जाते थे और रिश्वतखोरी या भाईभतीजावाद जैसी बुराई छिपाने में इस का अक्सर दरुपयोग किया जाता था.2004 के आम चुनावों में कांग्रेस ने आर.टी.आई. को एक महत्पूर्ण मुद्दा बनाया था.इस कानून के बनने के तुरंत बाद निचली श्रेणी और राष्ट्रीय स्तर के अधिकारीयों पर समान रूप से इसका असर देखा गया था.सूचना के अधिकार में आवेदन के जवाब में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने अपनी संपत्ति की घोषणा की थी.
बेगुसराए के शशिधर मिश्र ने भी स्थानीय ठेकेदारों,ग्राम-प्रधानों,राजनीतिबाजों,सरकारी अधिकारीयों और पोलिसे सबको सवालों के दायरे में खड़ा किया था.उसके द्वारा दायर एक अपील के चलते ही बेगुसराए रेलवे स्टेशन पर अवैध रूप से निर्मित एक डेयरी स्टाल को हटाया गया था.शशिधर की हत्या के मामले में पुलिस ने घर की तलाशी और ज्यादातर आर.टी.आई. आवेदनों को कब्ज़े में कर लिया .
सूचना का अधिकार लागू करने के अभियान में 1996 में चारा घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद तेज़ी आई और इसी साल के अंत में आंदोलनकर्ताओं, वकीलों,पत्रकारों और शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा नेशनल कैम्पेन फॉर पीपल्स राईट तो इन्फोर्मशन की स्थापना की गई और सूचना के अधिकार कानून का मसौदा तय्यार करके भारतीय जनता पार्टी सरकार के सामने पेश किया गया.इस प्रस्ताव पर 4 वर्ष तक कोई कार्यवाही नहीं हुई और अंतत; 2002 में एक बहुत सी मामूली से फ्रीडम ऑफ़ इन्फोर्मेशन एक्ट पर हस्ताक्षर किये गये,हलांकि एनसीपीआरई संगठन ने राजस्थान,तमिलनाडु,महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में राज्य पर सूचना का अधिकार कानून लागू करवाने में सफलता पाई.
2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने एक अधिक प्रगतिशील,सहभागी और सार्थक सूचना के अधिकार को लाने का वादा किया.कानून का मसौदा तय्यार करने के लिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में अरुणा राय को शामिल किया गया.गौरतलब है कि 90 के दशक की शुरुआत में राजस्थान में सूचना का अधिकार लागू करवाने में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरुणा राय की मुख्य भूमिका रही थी.
कानून का मसौदा तय्यार हो जाने पर कानून मंत्रालय की ओर से काफी विरोध हुआ था और बिल के कई महत्वपूर्ण अंशों की कांट-छांट भी की गई.लोगों के द्वारा मांगी गई सूचनाओं को उपलब्ध न करने के दोषी अधिकारीयों को दंड देने का प्रावधान हटा दिया गया था,जिसपर अरुणा राय ने खासा हल्ला भी मचाया था.
अंतत: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तछेप के बाद एक संसदीय समिति ने बिल का पुनरवलोकन करके 187 संशोधनों के साथ इसे संसद में फिर से पेश किया.15 मिनट की बहस के बाद एक सुधर को छोड़कर बाकि सरे सुधारों पर संसद में सहमती बनी.सूचना देने के लिए सूचना आयुक्त को मिली सिर्फ 30 दिन की समय सीमा को संसद सदस्यों ने नामंज़ूर कर दिया व अपीलों का जवाब देने के लिए बेमियादी समय देने का प्रावधान किया.अंतत: 12 अक्तूबर,2005 को ये कानून संसद में बड़ी धूमधाम से पारित हुआ.
सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 5 वर्ष होने के बाद भी भ्रष्टाचार खतम होता नहीं दिखता.आर.टी.आई. आन्दोलन के मुख्य कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल का कहना है ''शुरुआत से ही इस कानून को कई विरोधों का सामना करना पड़ा है व सभी राजनीतिक दलों व अधिकारीयों ने इस कानून को कमज़ोर करने की कोशिश की क्यूंकि लोगों से सूचनाओं को छिपा रखने की ताखत वह गवाना नहीं चाहते थे.इस कानून को पास करके नेताओं ने अपने लिए ही कब्र खोद ली है,इस बात को वे समझ चुके हैं और अब इसका तोड़ ढूंडने लगे है.''केजरीवाल आयकर विभाग में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
यक़ीनन इस कानून के तहत नागरिकों को अपनी अपनी सरकारों से जवाब तलब करने का अधिकार मिला है लेकिन दूसरी तरफ उनके निवेदनों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करने में ये कानून सफल नही है.ज़्यादातर सेवानिव्रत्त अधिकिरिओं को राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त का पद सौप दिया गया है पर वे निचली श्रेणी के भ्रष्ट अधिकारिओं को दण्डित करने से हिचकिचातें हैं.
बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए आर.टी.आई. दायर करने वालो पर जान का खतरा भी मंडराता रहता है.महाराष्ट्र में कई भूमि घोटालों को उजागर करने वाले सतीश शेट्टी की जनवरी 2010 में पुणे में हत्या की गई तथा फिर उसी साल बिहार के शशिधर मिश्रा की हत्या भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं के सिर पर मंडराते खतरे का दूसरा उदहारण था.
इसी के चलते केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री वीरप्पा मोइली ने सरकार की चुप्पी तोड़ी और मुखबिरों की पहचान को गुप्त रखने सम्बन्धी मसौदे को संसद के शीतकालीन सत्र में लाने का वादा किया,लेकिन संसद का शीतकालीन सत्र 2 जी स्पैक टर्म घोटाले पर हुए हंगामे की भेंट चढ़ गया.देश के शीर्ष लोगों तक को झकझोर देने वाले इस घोटाले ने एक बार फिर से एक शक्तिशाली सूचना के अधिकार के कानून की आवश्यकता महसूस कराई है क्यूंकि मौजूदा कानून भ्रष्ट राजनीतिबाजों,उधोग पतिओं और अधिकारिओं की मिलीभगत तोड़ने में अशक्त ही जन पड़ता है.
हलांकि कार्यकर्ताओं को इस कानून पर पूरा भरोसा है लेकिन इतना स्पष्ट है कि कानून बना देने मात्र से ही सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़तम नही किया जा सकता.सूचना आयुक्तों कि असमर्थता,अधिकारिओं कि टालमटोल की प्रवर्ती और सबसे महत्पूर्ण केंद्रीय सरकार के समर्थन और राजनीतिक इक्छाशक्ति का अभाव भी इस कानून के आड़े आता है.
दूसरी बात ये है कि सूचना के अधिकार के कारण काम का बोझ बढने कि शिकायत भी सरकारी कर्मचारी करते हैं जो कि गलत है.ये दरअसल सरकारी महकमे की ही खामी है,सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा-4 में साफ़ लिखा है की हर जन प्राधिकरण के लिए ये जरूरी है कि उसके सारे रिकॉर्ड जनता के लिए सुलभ हों और वह इन्हें इन्टरनेट पर अपलोड करे ताकि विभाग का काम पारदर्शी हो और जनता को रिकॉर्ड पेश किये जाने के लिए कोई आर.टी.आई. डालने कि जरूरत ही न पड़े.लेकिन अधिनियम पारित होने के 5 साल बाद भी इसपर पूरी तरह अमल नहीं किया गया है.
यहाँ तक कि सरकार भी इस अधिनियम के लिए सरकारी कर्मचारिओं में जागरूकता फैलाने व उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कोई खास कोशिश नहीं कर रही है.सरकार ने इस काम के लिए अरबों खरबों का बजट बनाया था,जिसमे से अब तक 6 करोड़ रुपए ही जनता व अधिकारीयों को जागरूक बनाने व प्रशिक्षित करने के लिए खर्च किये गये हैं.
सेवानिव्रत्त व बूढ़े हो चुके राजनेता ही अब राज्यों के सूचना आयुक्तों का पद संभल कर बेठे है,हालाँकि इन कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नही है कि कोई सामाजिक कार्यकर्ता इस पद पर आसीन नहीं हो सकता लेकिन आजतक ऐसे किसी व्यक्ति को यह पद नहीं सोंपा गया.यह इस कानून को कमज़ोर करने कि अधिकारिओं व भ्रष्ट नेताओं की मिलीभगत ही है.
इस बारे में सवाल करने पर न तो किसी नेता के पास कोई तर्कसंगत जवाब होता है न ही अधिकारी के पास.कुल मिला कर इस अधिनियम की स्तिथि दयनीये है.यहाँ तक कि समय समय पर इसमें कुछ न कुछ ऐसे बदलाव करने की मांग भी उठती रही है जो राजनीतिबाजों के अपने हित में है.इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी अपनी निराशा ज़ाहिर कर चुकीं हैं.प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को लिखे अपने पत्र में उन्होंने साफ कहा है कि हमें सूचना का अधिकार कानून लागू करने के अपने मुख्य उद्देश से भटकना नहीं चाहए.इस पत्र में उन्होंने कार्यकर्ताओं को मिल रही धमकिओं व अत्याचारों पर भी चिंता ज़ाहिर कि है.
लेकिन जो भी हो देश कि सबसे शक्तिशाली महिला की ये और चिंता समर्थन भी आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं को दिलासा दे पाने में नाकामयाब साबित हुआ है.

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