आज 25 दिसम्बर है..आज क्रिसमस डे है...यानी बड़ा दिन...इसलिए सबसे पहले आप सभी को मेरी तरफ से क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें....
क्रिसमस का ये त्यौहार कई वर्षों से इसी मनाते चले आये है...और अब तो हर धर्म के लोग इसे मनाते है...क्रिसमस का इतिहास कई वर्षों नही बल्कि चार हजार वर्ष पुराना है.बल्कि क्रिसमस की परम्परा ईसा के जन्म से शताब्दियों पुरानी है.क्रिसमस के दिन उपहारों का लेन देन,प्रार्थना गीत,अवकाश की पार्टी और चर्च के जुलूस सभी हमें बहुत पीछे ले जाते हैं.ये त्यौहार सोहार्द,आह्लाद और स्नेह का सन्देश देता है.एक शोध के अनुसार क्रिसमस एक रोमन त्यौहार सेंचुर्नेलिया का अनुकरण है.सेंचुर्नस रोमन देवता है.ये त्यौहार दिसम्बर के मध्यान से जनवरी तक चलता है.लोग तरह तरह के पकवान बनाते है...दोस्तों से मिलते है,पहले भी उपहारों का अदल बदल होता था.फूलों और हरे पेड़ों से घर सजाये जाते थे.यह तक की स्वामी और सेवक अपना स्थान भी बदलते थे.....
सौन्दर्यबोध के अनुसार कालांतर में ये त्यौहार बरुमेलिया यानि सर्दियों के बड़े दिन के रूप में मनाया जाने लगा.ईसवीं सन की चौथी शती तक ये त्यौहार क्रिसमस में विलय हो गया.क्रिसमस मनाने की विधि बहुत कुछ रोमन देवताओं के त्यौहार मनाने की विधि से उधार ली गई है.कहते हैं के ये त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में सन 98 से मनाया जाने लगा.सन 137 में रोम के बिशप ने इसे मनाने का स्पष्ट एलान किया सन 350 में रोम के एक अन्य बिशप्युलिअस ने दिसम्बर 25 को क्रिसमस के लिए चुनना था.इतिहासकारों की भी राये मिलती है दिसम्बर 25 दिसम्बर ईसा का जन्म दिन नहीं था.इस प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं मिलता की 25 दिसम्बर ही ईसा मसीह के जन्म का दिन है.न तो बाइबल इसका स्पष्ट उत्तर देती है और न ही इतिहासकार ईसा की जन्म तिथि कीघोषणा करते हैं.ऐसे तथ्य भी मिलते हैं,जिनसे स्पष्ट होता है कि ईसा का जन्म सर्दियों में नहीं हुआ था.यहीं पर ये तथ्य हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि क्रिसमस सर्दियों में ही क्यूँ मनाया जाता है.
एक शोध हमें इस त्यौहार का मूल मेंसो पोटामिया में खोजने को मजबूर करता है.मेंसो पोटामिया में लोग अनेक देवताओं पर विश्वास करते थे.लेकिन उनका सबसे बड़ा देवता मर्दुक था.हर साल सर्दियों के आने पर माना जाता था कि मर्दुक अव्यवस्था के दानवों से युद्ध करता है.मर्दुक कि इस संघर्ष कि मदद के तौर पर नये साल पर त्यौहार मनाया जाता था.मेंसो पटेमिया का राजा मर्दुक के मन्दिर में देव प्रतिभा के समक्ष वफादारी की कसम खाता था.परम्पराए राजा को साल के आखिर में युद्ध का आमन्त्रण देती थी ताकि वह मर्दुक की तरफ से युद्ध करता हुआ वापिस लौट सके.अपने राजा को जिंदा रखने के लिए मेंसो पोटामिया के लोग एक अपराधी का चयन करके उसे राजसी वस्त्र पहनते थे.उसे राजा का सम्मान और सभी अधिकार दिए जाते थे और आखिर में असली राजा को बचाने के लिए नकली राजा कि हत्या कर दी जाती थी.क्रिसमस के अंतर्गत मुख्य आवाज़ भगवान् को खुश करने की है.
पर्शिया और बेबिलोनिया में ऐसा ही एक त्यौहार सेंसिया नाम से मनाया जाता था.बाकि सभी रस्मों के साथ साथ इसमें एक और रसम थी कि दासों को स्वामी और स्वामियों को दास बना दिया जाता था.
युरेपियन लोग चुड़ेलों,भूतों और बुरी रूहों में विश्वास करते थे.जैसे ही सर्दी के छोटे दिन और लम्बी ठंडी रातें आती,लोगों के मन में डर समां जाता कि सूर्य देवता वापिस नहीं लौटेगे.सूर्य को वापिस लाने के लिए इन्ही दिनों ख़ास रीति रिवाजों का पालन होता.समारोह का आयोजन किया जाता.
स्कान्दिनाविया में सर्दी के महीनों में सूरज दिनों तक गायब रहता,सूरज की वापसी के लिए 35 दिन के बाद पहाड़ की चोटियों पर लोग स्काउट भेज देते.पहली रश्मि के ईद आने की शुभ सूचना के साथ ही स्काउट वापिस लौटते.इसी अवसर का यूल ताईद नामक त्यौहार मनाया जाता.आग के आस पास खान पान का आयोजन चलता है.अनेक जगहों पर लोग पेड़ों की शाखाओं से सेब लटका देते हैं.जिसका मतलब होता है कि बसंत और गर्मियां जरुर आएगी.
पहले यूनान में भी इससे मिलता जुलता एक एक त्यौहार मनाया जाता था .इसमें लोग देवता क्रोनोस की मदद करते थे .ताकि वह ज्यूस और सभी साथी बुरी रूहों लड़ से सके.
कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ईसाइयों का क्रिसमस त्यौहार नास्तिकों के दिसम्बर समारोह को चुनौती है.क्यूंकि 25 दिसम्बर मात्र रोम मनसो पोटामिया,बेबीलोन,या यूनान के समारोह का दिन नहीं था,बल्कि उन पश्चिमी लोगों के लिए भी था,जनका धर्म ईसाइयत के खिलाफ था.
ईसाईयों का धर्म ग्रन्थ बाइबल के नाम से जाना जाता है.मूलत: ये यहुदिओं और ईसाईयों का साझा धर्म ग्रन्थ है.जिसके ओल्ड टेस्टामेंट न्यू टेस्टामेंट दो भाग हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्राइस्ट के जन्म से पहले के हालात अंकित हैं.इसमें 39 किताबें हैं,न्यू टेस्टामेंट में ईसा का जीवन,शिक्षाएं एवं विचार हैं.इसमें 27 किताबें हैं.यानी बाइबल 66 किताबों का संग्रह है.1600 सालों में 40 लेखकों ने लिखा.इसमें मिथ्कीये ,काल्पनिक और इतिहासिक प्रसंग हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्रीस्ट के जन्म विषयक भविष्य वाणी हैं.एक कहानी के अनुसार बढई युसूफ और मंगेतर मेरी नजरेन में रहते थे.मेरी को खवाब में दिखा कि उसे देव शिशु के जन्म के लिए चुना गया है.इसी बीच वहां के राजा ने नये कर लगाने के लिए लोगों के पंजी करण की घोषणा की.जिसके लिए युसूफ और मेरी को अपने गाँव बेथलहम जाना पड़ा.मेरी गर्भवती थी.कई दिनों के सफ़र के बाद वह बेथलहम पहुची.तब तक रात हो चुकी थी.उसे सराय में आराम के लिए कोई जगह नहीं मिली.जन युसूफ ने विश्राम घर के रक्षक को बताया की मेरी गर्भवती और उसका प्रसव समय निकट है तो उसने पास के पहाड़ों की उन गुफाओं के बारे में बताया,जिनमें गडरिये रहते थे.युसूफ और मेरी एक गुफा में पहुचे.युसूफ ने खुरली साफ़ की.उसमे नर्म,सूखी घास का गद्दा बनाया.अगली सुबह वहीँ मेरी ने शिशु को जन्म दिया.देव कि इक्छा के अनुसार उसका नाम युसूफ रखा गया.कालांतर में १२ साल के ईशु ने ही धर्मचर्या में श्रोताओं को मुग्ध कर लिया.तीस साल की उम्र में अपने चचेरे भाई से बप्तिस्मा याबी अमृत लिया.शासक द्वारा जान की हत्या के बाद वह खुद बप्तिस्मा देने लगे.यीशु के प्रचारों के कारण यहूदी शासक और कट्टरपंथी उनके विरोधी बन गये.उनपर अनेक अपराध थोपे गये.कोई मारे गये.उन्हें सूली पर लटकाया गया.म्रत्यु दंड दिया गया.
आज क्रिसमस का त्यौहार हर साल ईसा मसीह के जन्म दिन के आविर्भाव के उपलक्ष में मनाया जाता है.भले ही इसके मूल में अनेक देशों की परम्पराओं का सम्मिश्रण हो...........
क्रिसमस का ये त्यौहार कई वर्षों से इसी मनाते चले आये है...और अब तो हर धर्म के लोग इसे मनाते है...क्रिसमस का इतिहास कई वर्षों नही बल्कि चार हजार वर्ष पुराना है.बल्कि क्रिसमस की परम्परा ईसा के जन्म से शताब्दियों पुरानी है.क्रिसमस के दिन उपहारों का लेन देन,प्रार्थना गीत,अवकाश की पार्टी और चर्च के जुलूस सभी हमें बहुत पीछे ले जाते हैं.ये त्यौहार सोहार्द,आह्लाद और स्नेह का सन्देश देता है.एक शोध के अनुसार क्रिसमस एक रोमन त्यौहार सेंचुर्नेलिया का अनुकरण है.सेंचुर्नस रोमन देवता है.ये त्यौहार दिसम्बर के मध्यान से जनवरी तक चलता है.लोग तरह तरह के पकवान बनाते है...दोस्तों से मिलते है,पहले भी उपहारों का अदल बदल होता था.फूलों और हरे पेड़ों से घर सजाये जाते थे.यह तक की स्वामी और सेवक अपना स्थान भी बदलते थे.....
सौन्दर्यबोध के अनुसार कालांतर में ये त्यौहार बरुमेलिया यानि सर्दियों के बड़े दिन के रूप में मनाया जाने लगा.ईसवीं सन की चौथी शती तक ये त्यौहार क्रिसमस में विलय हो गया.क्रिसमस मनाने की विधि बहुत कुछ रोमन देवताओं के त्यौहार मनाने की विधि से उधार ली गई है.कहते हैं के ये त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में सन 98 से मनाया जाने लगा.सन 137 में रोम के बिशप ने इसे मनाने का स्पष्ट एलान किया सन 350 में रोम के एक अन्य बिशप्युलिअस ने दिसम्बर 25 को क्रिसमस के लिए चुनना था.इतिहासकारों की भी राये मिलती है दिसम्बर 25 दिसम्बर ईसा का जन्म दिन नहीं था.इस प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं मिलता की 25 दिसम्बर ही ईसा मसीह के जन्म का दिन है.न तो बाइबल इसका स्पष्ट उत्तर देती है और न ही इतिहासकार ईसा की जन्म तिथि कीघोषणा करते हैं.ऐसे तथ्य भी मिलते हैं,जिनसे स्पष्ट होता है कि ईसा का जन्म सर्दियों में नहीं हुआ था.यहीं पर ये तथ्य हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि क्रिसमस सर्दियों में ही क्यूँ मनाया जाता है.
एक शोध हमें इस त्यौहार का मूल मेंसो पोटामिया में खोजने को मजबूर करता है.मेंसो पोटामिया में लोग अनेक देवताओं पर विश्वास करते थे.लेकिन उनका सबसे बड़ा देवता मर्दुक था.हर साल सर्दियों के आने पर माना जाता था कि मर्दुक अव्यवस्था के दानवों से युद्ध करता है.मर्दुक कि इस संघर्ष कि मदद के तौर पर नये साल पर त्यौहार मनाया जाता था.मेंसो पटेमिया का राजा मर्दुक के मन्दिर में देव प्रतिभा के समक्ष वफादारी की कसम खाता था.परम्पराए राजा को साल के आखिर में युद्ध का आमन्त्रण देती थी ताकि वह मर्दुक की तरफ से युद्ध करता हुआ वापिस लौट सके.अपने राजा को जिंदा रखने के लिए मेंसो पोटामिया के लोग एक अपराधी का चयन करके उसे राजसी वस्त्र पहनते थे.उसे राजा का सम्मान और सभी अधिकार दिए जाते थे और आखिर में असली राजा को बचाने के लिए नकली राजा कि हत्या कर दी जाती थी.क्रिसमस के अंतर्गत मुख्य आवाज़ भगवान् को खुश करने की है.
पर्शिया और बेबिलोनिया में ऐसा ही एक त्यौहार सेंसिया नाम से मनाया जाता था.बाकि सभी रस्मों के साथ साथ इसमें एक और रसम थी कि दासों को स्वामी और स्वामियों को दास बना दिया जाता था.
युरेपियन लोग चुड़ेलों,भूतों और बुरी रूहों में विश्वास करते थे.जैसे ही सर्दी के छोटे दिन और लम्बी ठंडी रातें आती,लोगों के मन में डर समां जाता कि सूर्य देवता वापिस नहीं लौटेगे.सूर्य को वापिस लाने के लिए इन्ही दिनों ख़ास रीति रिवाजों का पालन होता.समारोह का आयोजन किया जाता.
स्कान्दिनाविया में सर्दी के महीनों में सूरज दिनों तक गायब रहता,सूरज की वापसी के लिए 35 दिन के बाद पहाड़ की चोटियों पर लोग स्काउट भेज देते.पहली रश्मि के ईद आने की शुभ सूचना के साथ ही स्काउट वापिस लौटते.इसी अवसर का यूल ताईद नामक त्यौहार मनाया जाता.आग के आस पास खान पान का आयोजन चलता है.अनेक जगहों पर लोग पेड़ों की शाखाओं से सेब लटका देते हैं.जिसका मतलब होता है कि बसंत और गर्मियां जरुर आएगी.
पहले यूनान में भी इससे मिलता जुलता एक एक त्यौहार मनाया जाता था .इसमें लोग देवता क्रोनोस की मदद करते थे .ताकि वह ज्यूस और सभी साथी बुरी रूहों लड़ से सके.
कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ईसाइयों का क्रिसमस त्यौहार नास्तिकों के दिसम्बर समारोह को चुनौती है.क्यूंकि 25 दिसम्बर मात्र रोम मनसो पोटामिया,बेबीलोन,या यूनान के समारोह का दिन नहीं था,बल्कि उन पश्चिमी लोगों के लिए भी था,जनका धर्म ईसाइयत के खिलाफ था.
ईसाईयों का धर्म ग्रन्थ बाइबल के नाम से जाना जाता है.मूलत: ये यहुदिओं और ईसाईयों का साझा धर्म ग्रन्थ है.जिसके ओल्ड टेस्टामेंट न्यू टेस्टामेंट दो भाग हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्राइस्ट के जन्म से पहले के हालात अंकित हैं.इसमें 39 किताबें हैं,न्यू टेस्टामेंट में ईसा का जीवन,शिक्षाएं एवं विचार हैं.इसमें 27 किताबें हैं.यानी बाइबल 66 किताबों का संग्रह है.1600 सालों में 40 लेखकों ने लिखा.इसमें मिथ्कीये ,काल्पनिक और इतिहासिक प्रसंग हैं.ओल्ड टेस्टामेंट में क्रीस्ट के जन्म विषयक भविष्य वाणी हैं.एक कहानी के अनुसार बढई युसूफ और मंगेतर मेरी नजरेन में रहते थे.मेरी को खवाब में दिखा कि उसे देव शिशु के जन्म के लिए चुना गया है.इसी बीच वहां के राजा ने नये कर लगाने के लिए लोगों के पंजी करण की घोषणा की.जिसके लिए युसूफ और मेरी को अपने गाँव बेथलहम जाना पड़ा.मेरी गर्भवती थी.कई दिनों के सफ़र के बाद वह बेथलहम पहुची.तब तक रात हो चुकी थी.उसे सराय में आराम के लिए कोई जगह नहीं मिली.जन युसूफ ने विश्राम घर के रक्षक को बताया की मेरी गर्भवती और उसका प्रसव समय निकट है तो उसने पास के पहाड़ों की उन गुफाओं के बारे में बताया,जिनमें गडरिये रहते थे.युसूफ और मेरी एक गुफा में पहुचे.युसूफ ने खुरली साफ़ की.उसमे नर्म,सूखी घास का गद्दा बनाया.अगली सुबह वहीँ मेरी ने शिशु को जन्म दिया.देव कि इक्छा के अनुसार उसका नाम युसूफ रखा गया.कालांतर में १२ साल के ईशु ने ही धर्मचर्या में श्रोताओं को मुग्ध कर लिया.तीस साल की उम्र में अपने चचेरे भाई से बप्तिस्मा याबी अमृत लिया.शासक द्वारा जान की हत्या के बाद वह खुद बप्तिस्मा देने लगे.यीशु के प्रचारों के कारण यहूदी शासक और कट्टरपंथी उनके विरोधी बन गये.उनपर अनेक अपराध थोपे गये.कोई मारे गये.उन्हें सूली पर लटकाया गया.म्रत्यु दंड दिया गया.
आज क्रिसमस का त्यौहार हर साल ईसा मसीह के जन्म दिन के आविर्भाव के उपलक्ष में मनाया जाता है.भले ही इसके मूल में अनेक देशों की परम्पराओं का सम्मिश्रण हो...........






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