Thursday, 15 December 2011

super bug ka havva.........


        दुनिया भर के लिए खतरा बनकर उभरे सुपरबग को भारत से जोड़ना या इसका नाम दिल्ली के नाम पर रखा जाना तर्कसंगत नहीं है.सुपरबग के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर हमले की साजिश रच रहे हैं. 
                       आखिर क्या है सुपरबग?
ये सवाल उठाना लाज़मी है कि आखिर क्या है ये सुपरबग.वास्तव में सुपरबग एक खास तरह के बैक्टीरिया को कहा गया है.ये बैक्टीरिया इसलिए सुपरबग कहलाता है क्यूंकि इस पर एंटीबायोटिक्स दवाओं का असर नही होता.इस तरह के बैक्टीरिया से निबटने के लिए जिन दवाओं से एंटीबायोटिक्स को तैयार किया गया है.ये बैक्टीरिया उन दवाओं में एंटीबायोटिक्स को खत्म करने की अपने अन्दर एक खास तरह कि ताखत विकसित कर लेते हैं.इससे वे दवाएं बेअसर हो जाती है.इसी कारण ये बैक्टीरिया सुपरबग कहलाते हैं.
   युद्ध केवल गोला बारूद से नही लड़ा जाता इसके और भी कई तरीके हैं.इन्ही तरीकों में से एक है आर्थिक हमला.इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी हमला चल रहा है.जिसक नाम है नई दिल्ली मेटालो-1 यानि नई दिल्ली नाम का एक सुपरबग.
गौरतलब है कि भारत में हेल्थ पर्यटन बड़े पैमाने पर सफल हो रहा है.आंकड़े बताते हैं कि भारत का हेल्थ पर्यटन महज़ 1 ,450 करोड़ रुपए का है.भारत के विभिन्न महानगरों में विकसित देशों से भी लोग इलाज करवाने आ रहे हैं.इसके पीछे वजह ये है कि विकसित देशों कि तुलना में भारत में इलाज का खर्च सस्ता है
              अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा कि सुविधा तो है लेकिन इसका लाभ सब नही उठा पाते.कहते है कि 4 करोड़ अमेरिकियों का बीमा नहीं है,क्यूंकि यहाँ प्रीमियम इतना ज्यादा है कि भारत आकर इलाज करवाना सस्ता पड़ता है.यही वजह है कि भारत में मेडिकल टूरिस्म तेज़ी से फलफूल रहा है.
                                          नई दिल्ली मेटाले-1 क्यूँ?
             ब्रिटिश वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक शोध में ये दावा किया गया है कि एक खास तरह का बेक्टीरिया जिस पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता है.भारतीय उपमहादीप से निकल कर तेज़ी से पूरी दुनिया में फैल रहा है.इसीलिए शोधकर्ताओं ने इस बेक्टीरिया का नाम न्यू दिल्ली मेटालो-बी-लेक्टामेस-1 दे दिया है.इस तरह के सुपरबग की भारत में भरमार है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के बग का पता पहली बार 2008 में चला था.भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो स्वीडन का प्रवासी था.भारत आया उसे डाई बिटीज़ थी.उसे एक घाव हुआ जो सूखने का नाम नही ले रहा था.
         2008 में वह भारत से स्वीडन लौटा और उसने घाव का इलाज करवाया.इलाज के दौरान कई टेस्ट करवाए गये.ब्रिटिश वैज्ञानिकों का दावा है कि इस बैक्टीरिया से उसे कोई नुकसान नहीं था और न ही उसकी किडनी में संक्रमण था.इसके बाद मरीज़ के डीएनए की जाँच की गई तो उसके शरीर में एक खास तरह के इंजाइम का पता चला.चूँकि मरीज़ भारतीय मूल का निवासी था और भारत से लौटकर वह घाव का इलाज करवाने आया था इसलिए इस बैक्टीरिया का नाम नई दिल्ली मेटालो रख दिया गया.
                                                  भारत में प्रतिक्रिया  
          जहाँ तक इस बैक्टीरिया के नामकरण का सवाल है तो इसे भारत की राजधानी नई दिल्ली से जोड़कर रखे जाने पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.हर तरफ से इसका विरोध किया गया है.भारत ने इसके नामकरण पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है.इतना ही नहीं,रिपोर्ट को भारत सरकार ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है.इंडियन काउन्सिल एंड मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ कम्युनिकेबल डिसीज़ ने इस तरह के प्रचार को भारतीय डाक्टरों और अस्पतालों के खिलाफ साजिश करार दिया है.
                                          खतरनाक तो अमेरिकी सुपरबग है.....
        कोलकाता मेडिकल कॉलेज के माइक्रो बायोलोजी विभाग के डॉ.रतन कुमार नाथ का मानना है कि यूरोप और अमेरिका में ऐसे सुपरबग जिनपर एंटीबायोटिक्स का असर नही होता इसकी समस्या कोई नई बात नहीं है,इस तरह के बहुत से सुपरबग पहले से ही विकसित देशों में पाए जाते हैं और ये तथाकथित एनडीएम्-1 कि तुलना में कही ज्यादा खतरनाक है.आंकड़े बताते है कि अमेरिका में सी डिफीसाईल नामक सुपरबग लम्बे समय से तांडव कर रहा है.अमेरिका के इस सुपरबग से संक्रमण का खतरा आम है.2005 के बाद एम्.आर.एस.ए.कि तुलना में सी डिफीसाईल से संक्रमण कि संख्या बढती जा रही है.इससे डाईरिया और बहुत सारे मामलों में आँतों कि सूजन कि बीमारी सामने आती है.इससे साफ़ है कि ये दोनों अमेरिकी सुपरबग बहुत ज्यादा खतरनाक हैं.
                                              संकीर्ण दायरे से उठाना जरूरी...
        जहाँ तक चर्चित सुपरबग एन.डी.एम्-1 का सवाल है तो इसके नामकरण पर आपत्ति जरुर कि जनि चाहिए.किसी भी ऐसे सुपरबग के लिए किसी देश पर ऊँगली उठाना गलत है.एड्स आज पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है.लेकिन इस बीमारी को अमेरिका या यूरोप के नाम के साथ नही जोड़ा जाता.जहाँ तक किसी भी सुपरबग के दुनिया भर में फैलने वाले खतरे का सवाल है तो उसको किसी देश या श्रेत्रसे न जोड़कर उससे कैसे निबटा जाये,इसपर विचार किया जाना चाहिये.
   एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल बहुत सोचविचार कर किया जाना चाहिए.एक समय के बाद बैक्टीरिया अपने भीतर भी एंटीबायोटिक्स से निबटने कि ताखत बढ़ा लेते हैं.ज़ाहिर है तब उनमे एंटीबायोटिक्स से निबटने कि ऊर्जा नही होती और ये स्तिथि खतरनाक हो जाती है.फिलहाल हर तरह के सुपरबग को चुनौती देने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एकजुट होकर काम करना चाहिए. न कि सीमित दायरे कि सोच लेकर किसी देश पर ऊँगली उठाई जाये.  
          

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