Saturday, 17 December 2011

bhartiye cinema ke sadabahar raj kapoor


भारतीय सिनेमा की एक अनमोल देन हैं राज कपूर..............
राजकपूर निर्माता,निर्देशक और अभिनेता के रूप में भारतीय सिनेमा जगत में पहचाने जाते रहेंगे.आज़ादी के बाद हिंदी सिनेमा में राजकपूर ही सबसे अधिक ताखत से कहते हैं कि''कलाकार किसी कि तरह बन सकता.वह कलाकार होता ही नही जो किसी कि तरह बनना चाहता है.उसे सिर्फ अपनी राह चलने कि जिद रही है.इसीलिए वह गिर गिर कर उठा और उठ उठ कर गिरा''
 राजकपूर का जन्म पेशावर(पाकिस्तान)में 14 दिसम्बर सन 1924 में हुआ था.राजकपूर के पिता अभिनेता पृथ्वी राजकपूर थे.राजकपूर के दो छोटे भाई अभिनेता शशि कपूर और शम्मी कपूर और एक बहन उर्मिला सेन थी.22 वर्ष की उम्र में राजकपूर का विवाह कृष्णा मल्होत्रा से हुआ.
  राजकपूर पहली बार सन 1935 में फिल्म इंकलाब में दिखाई दिए.बारह वर्षों तक बहुत सी फिल्मों में काम करने के बाद सन 1947 में नील कमल में मुख्य भूमिका की.24 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना स्टूडियो आर.के फिल्म्स बनाया और अपने वक़्त के सबसे कम उम्र के निर्देशक बन गये.उनकी पहली फिल्म बतौर निर्माता,निर्देशक और अभिनेता के रूप में आग (1948 )थी जिसको सफलता नही मिल सकी.आग की एक उपलब्धि थी राजकपूर की फिल्मों में नायिका के तौर पर नर्गिस का आगमन.1948 में राजकपूर और नर्गिस की जोड़ी जो बनी वहीं हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक और विलक्षण स्टार जोड़ी साबित हुई.राजकपूर ने 1948 से 1988 तक निर्देशक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बहुत सी फिल्मों से यादगार बन गये.उनमें बरसात (1949 )आवारा (1951 )श्री 420 (1955 ) और जिस देश में गंगा बहती है (1960 )हैं.1964 में निर्माता,निर्देशक के रूप में संगम प्रदर्शित हुई जो उनकी पहली रंगीन फिल्म थी.ये उनकी अभिनेता के रूप में आखिरी सबसे बड़ी सफलता थी.
                  1970 में मेरा नाम जोकर प्रदर्शित हुई जो असफल रही.इस फिल्म को बनाने में 6 वर्ष से अधिक समय लगा.यह फिल्म राजकपूर के जीवन का सपना थी.उनको इस असफलता से गहरा आघात लगा.इसके बाद उनकी फिल्म निर्माण दिशा में परिवर्तन आया.1973 में निर्माता,निर्देशक के रूप में बोबी फिल्म प्रदर्शित हुई.जिसने अपार सफलता अर्जित की.बोबी फिल्म से उनके पुत्र ऋषि कपूर और डिम्पल कपाडिया ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की.डिम्पल को इस फिल्म से काफी प्रसिद्धी मिली.ये फिल्म युवा पीढ़ी के रोमांस पर आधारित थी.डिम्पल की इस फिल्म में जो वेशभूषा थी वह उस वक़्त की भारतीय फिल्मों से अलग थी.राजकपूर ने फिर औरतों की भूमिकाओं को प्रधानता देकर सत्यम शिवम् सुन्दरम;1978 (जीनत अमान),प्रेमरोग 1982 ;(पदमिनी कोल्हापुरी),और राम तेरी गंगा मैली ;(मन्दाकिनी)फ़िल्में बनाई.राजकपूर की आखिरी सबसे बड़ी फिल्म जिसमें वह दिखे वकील बाबू (1982 )थी.
         राजकपूर अस्तमा के रोगी थे.1988 में अस्तमा के कारण उनका निधन हो गया.उस वक़्त वह 63 साल के थे.अपने देहांत से पहले वह हिना फिल्म पर काम कर रहे थे जो बाद में ऋषि कपूर ने पूरी की और ये 1991 में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर पार अपार सफलता मिली.
         फिल्म समीक्षक और साधारण फिल्म दर्शक सभी ने राजकपूर को खूब सराहा है.फिल्म इतिहासकार और फिल्मों के दीवाने सब उन्हें भारतीय फिल्म का चार्ली चैपलिन कहते हैं.उनकी प्रसिद्धी विश्व भर में है.अफ्रीका,मध्य-पूर्वी रूस(सोवियत संघ),चीन,दक्षिण-पूर्वी एशिया आदि हर जगह पर उनकी खूब प्रशंसा हुई.राजकपूर भारतीय सिनेमा के पथ प्रदर्शकों में से एक हैं.उनके अन्दर लोगों की दिलचस्पी को पहचानने और फिल्मों की गहरी समझ थी.आग,श्री 420 ,और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फिल्मों में देश भक्ति का सन्देश मिलता है.जिसने फिल्म निर्माताओं को देश भक्ति फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित किया.
      राजकपूर की फिल्मों में गीतों के चित्रांकन को देखना एक विशिष्ट अनुभव है.गानों को उन्होंने अपनी फिल्मों में फिलर के रूप में इस्तेमाल नही किया.उनकी फिल्मों के गीत फिल्मों की ताखत होते थे.राजकपूर की अधिकतर फिल्मों में मुख्यता संगीत निर्देशक शंकर जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी तथा शेलेन्द्र थे.निमी, डिम्पल कपाडिया,नर्गिस और मन्दाकिनी ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत राजकूपर की फिल्मों से ही की.राजकपूर ने पुत्रों ऋषि कपूर,रंधीर कपूर और राजीव कपूर का फ़िल्मी जीवन निखारने में पूरी तरह से मदद की.
                 राजकपूर को कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया.उन्हें 9  फिल्म फेयर अवार्ड और 19 नोमिनेशन मिले हैं.1971 में भारत सरकार ने उन्हें पदम् भूषण से सम्मानित किया.1987 में उन्हें सिनेमा जगत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला.2001 में उन्हें स्टार डस्ट अवार्ड द्वारा बेस्ट डिरेक्टर ऑफ़ मिलेनियम की उपाधि से नवाज़ा गया.2002 में उन्हें स्टार स्क्रीन अवार्ड में शो मैन ऑफ़ मिलेनियम की उपाधि दी गई.
  राजकपूर भारतीय सिनेमा के सदाबहार हीरो हैं..उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक नई पहचान दिलाई है..जिसे कभी नही भूला जा सकता.

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