लखनऊ के नर्सिंग होम में 1 नवम्बर को जन्मी नर्गिस दुनिया की सात अरबवीं बच्ची है.भारतीय इस बात के लिए फक्र कर सकते हैं कि सात अरबवां बच्चा उनके देश में जन्मा.हलांकि इसपर विवाद भी है लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि दुनिया जनसंख्या विस्फोट के कगार पर खड़ी है.संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक सदी के अंत तक दुनिया की आबादी दस अरब को पार कर जाएगी.इसमें से आधे से ज्यादा एशिया के इलाको में होगी जिसमे भारत भी है.
भारत में बढती आबादी की बात करें तो जनसंख्या आयोग के जरिये हाल ही में जारी किये गये आकड़ों के मुताबिक भारत की जनसंख्या आज के समय में एक अरब,इक्कीस करोड़ को पार कर चुकी है.जो साल २०२० तक डेढ़ अरब के आंकड़े को पार कर जाएगी.
देश में लगातार बढती आबादी से एक चीज़ अंतर राष्ट्रीय स्तर पर हासिल हो गई की भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश बन गया दूसरा ख़ास मकसद जो हमें आज़ादी के बाद कुछ ही दशकों में हासिल कर लेने चाहिए थे वह 6 दशक बाद भी देश हासिल नहीं कर सका जिसके लिए जनसंख्या विस्फोट खास वजह मानी जा सकती है.
पिछले दशकों में जिस तेज़ी से देश की जनसंख्या बढ़ी उतनी तेज़ी से देश के संसाधनों में बढ़ोतरी दर्ज नही की गई.जिसमें देश में अशिक्षा,गरीबी,किसानों की आत्महत्या एवं भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोतरी हुई.
तेज़ी से बढती आबादी का ये बुरा असर रहा कि भारतीय अर्थ व्यवस्था उतनी तेज़ी से अपना असर नहीं दिखा पाई.जिसका नतीजा ये हुआ कि उपभोगता बढ़े लेकिन चीज़ें कम होती गईं.अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होते गये.मध्य वर्ग का तो समाज से लोप ही होता गया.हलांकि अब मध्य वर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है.यकीन सबसे बढ़ी परेशानी ये खड़ी हो गई है कि एक अरब से ज्यादा आबादी में सुविधाओं का वितरण कैसे किया जाये?उन्हें जनसंख्या नियन्त्रण के बारे में कैसे जानकारी दी जाये और शिक्षा और सरकारी सुविधाएँ कैसे पहुंचाई जाये.
दुनिया की आबादी अब सात अरब की संख्या भी पार कर चुकी है और जानकारों की मानें तो सदी के अंत तक ये बढ़कर दस अरब से भी ज्यादा हो जाएगी.ये आँकड़ें चिंता जनक जरुर हैं लेकिन अब भी हालात उतने विस्फोटक नहीं.
सत्तर के दशक में भारत की जनसंख्या व्रद्धी दर २.४ से २.७% के बीच थी जो अब घटकर १.५% रह गई है.तमिलनाडु,मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे ११-१२ राज्य हैं जहाँ की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है.इसलिए उम्मीद की जनि चाहिए कि आने वाले वक़्त में जैसे जैसे हमारा विकास तेज़ होगा और लोगों में जागरूकता आयगी,बढती आबादी में भी गिरावट देखने को मिलेगी.लेकिन इसके लिए किसी तरह की जोर जबरदस्ती की जरूरत नहीं और ऐसी नीति या कोशिश भारत में कारगर भी नहीं हो सकती.अतीत में हम ऐसा करके देख भी चुके हैं,लेकिन नतीजे नकरात्मक.
बढती आबादी के सन्दर्भ में आज ये चिंता भी ज़ाहिर की जा रही है आज आबादी को ही पर्याप्त सुविधाएँ और खाद्दान्न उपलब्ध नही करवा प् रहे हैं,तो बहुत बड़ी आबादी के लिए ये कैसे मुमकिन होगा?
असल में यहाँ सवाल खाद्दान्न उपलब्धता से ज्यादा इसके उपभोग का है और ये भी की हमारी नीति किस तरह की है.अमेरीकामे जहाँ हर व्यक्ति पर अनाज कि उपलब्धता १००० किलोग्राम वार्षिक है वहीँ भारत में ये उपलब्धता प्रति व्यक्ति महज़ १८० किलोग्राम है.
इसे लेकर सवाल उठाये जा सकते हैं,लेकिन हमें इस सन्दर्भ में अमेरिका और भारत में अनाजों के उपयोग के पैटर्न को भी देखना होगा.अमेरिका में शाकाहार के बजाये मांसाहार का प्रचलन ज्यादा है और हम जानते हैं की एक किलो मांस पाने के लिए ६ किलो अनाज खिलने की जरूरत होती है.
अमेरिका में तो मवेशियों को अनाज खिलाया जाता है,ताकि उनसे ज्यादा मांस मिल सके.साफ़ है की अगर हम शाकाहार पर जोर दें तो अमेरिका से कम अनाज उपलब्धता के बावजूद हमें ख़ास परेशानी नहीं होने वाली.इसी तरह अनाज का इस्तेमाल खाने के अलावा औद्योगिक कामों के लिए भी बढ़ चढ़ कर हो रहा है फिर चाहें बात बयोफुएल तय्यार करने की हो या गडिओं को चलाने के लिए जरूरी इंधन पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनाल तय्यार करने की जरूरत-इन सबके लिए धड़ल्ले से अनाज का इस्तेमाल किया जा रहा है.
इन सारे कारणों से खाद्दान्नों पर दबाव बढ़ा है और पर्याप्त उपलब्ध होने के बावजूद लोग भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं.इसी वजह से अगर हम उपभोग की प्रक्रति में बदलाव ला सकें और अनाज के औद्योगिक प्रयोगों को सीमित करके दुसरे विकल्प अपना सकें तो इस परेशानी का हल मुमकिन है और बढती हुई आबादी को हम भरपूर खाद्दान्न उपलब्ध करवा सकेंगे.ये सरकार की नीतिगत युजना का हिस्सा है कि वह इसे किस तरह हल करना चाहती है.
बढती आबादी का एक और जबरदस्त असर सामाजिक सांस्क्रतिक भी होता है.भारत की कुल आबादी का ३३% हिस्सा शहरों में रहने लगा है,और हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है.आने वाले वक़्त में शहरी करण की यह प्रव्रत्ति और भी तेज़ होगी और हम ये भी जानते हैं की आज शहरों में एक बड़े हिस्से के पास समुचित साधन नहीं हैं.
भारत में बढती आबादी की बात करें तो जनसंख्या आयोग के जरिये हाल ही में जारी किये गये आकड़ों के मुताबिक भारत की जनसंख्या आज के समय में एक अरब,इक्कीस करोड़ को पार कर चुकी है.जो साल २०२० तक डेढ़ अरब के आंकड़े को पार कर जाएगी.
देश में लगातार बढती आबादी से एक चीज़ अंतर राष्ट्रीय स्तर पर हासिल हो गई की भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश बन गया दूसरा ख़ास मकसद जो हमें आज़ादी के बाद कुछ ही दशकों में हासिल कर लेने चाहिए थे वह 6 दशक बाद भी देश हासिल नहीं कर सका जिसके लिए जनसंख्या विस्फोट खास वजह मानी जा सकती है.
पिछले दशकों में जिस तेज़ी से देश की जनसंख्या बढ़ी उतनी तेज़ी से देश के संसाधनों में बढ़ोतरी दर्ज नही की गई.जिसमें देश में अशिक्षा,गरीबी,किसानों की आत्महत्या एवं भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोतरी हुई.
तेज़ी से बढती आबादी का ये बुरा असर रहा कि भारतीय अर्थ व्यवस्था उतनी तेज़ी से अपना असर नहीं दिखा पाई.जिसका नतीजा ये हुआ कि उपभोगता बढ़े लेकिन चीज़ें कम होती गईं.अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होते गये.मध्य वर्ग का तो समाज से लोप ही होता गया.हलांकि अब मध्य वर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है.यकीन सबसे बढ़ी परेशानी ये खड़ी हो गई है कि एक अरब से ज्यादा आबादी में सुविधाओं का वितरण कैसे किया जाये?उन्हें जनसंख्या नियन्त्रण के बारे में कैसे जानकारी दी जाये और शिक्षा और सरकारी सुविधाएँ कैसे पहुंचाई जाये.
दुनिया की आबादी अब सात अरब की संख्या भी पार कर चुकी है और जानकारों की मानें तो सदी के अंत तक ये बढ़कर दस अरब से भी ज्यादा हो जाएगी.ये आँकड़ें चिंता जनक जरुर हैं लेकिन अब भी हालात उतने विस्फोटक नहीं.
सत्तर के दशक में भारत की जनसंख्या व्रद्धी दर २.४ से २.७% के बीच थी जो अब घटकर १.५% रह गई है.तमिलनाडु,मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे ११-१२ राज्य हैं जहाँ की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है.इसलिए उम्मीद की जनि चाहिए कि आने वाले वक़्त में जैसे जैसे हमारा विकास तेज़ होगा और लोगों में जागरूकता आयगी,बढती आबादी में भी गिरावट देखने को मिलेगी.लेकिन इसके लिए किसी तरह की जोर जबरदस्ती की जरूरत नहीं और ऐसी नीति या कोशिश भारत में कारगर भी नहीं हो सकती.अतीत में हम ऐसा करके देख भी चुके हैं,लेकिन नतीजे नकरात्मक.
बढती आबादी के सन्दर्भ में आज ये चिंता भी ज़ाहिर की जा रही है आज आबादी को ही पर्याप्त सुविधाएँ और खाद्दान्न उपलब्ध नही करवा प् रहे हैं,तो बहुत बड़ी आबादी के लिए ये कैसे मुमकिन होगा?
असल में यहाँ सवाल खाद्दान्न उपलब्धता से ज्यादा इसके उपभोग का है और ये भी की हमारी नीति किस तरह की है.अमेरीकामे जहाँ हर व्यक्ति पर अनाज कि उपलब्धता १००० किलोग्राम वार्षिक है वहीँ भारत में ये उपलब्धता प्रति व्यक्ति महज़ १८० किलोग्राम है.
इसे लेकर सवाल उठाये जा सकते हैं,लेकिन हमें इस सन्दर्भ में अमेरिका और भारत में अनाजों के उपयोग के पैटर्न को भी देखना होगा.अमेरिका में शाकाहार के बजाये मांसाहार का प्रचलन ज्यादा है और हम जानते हैं की एक किलो मांस पाने के लिए ६ किलो अनाज खिलने की जरूरत होती है.
अमेरिका में तो मवेशियों को अनाज खिलाया जाता है,ताकि उनसे ज्यादा मांस मिल सके.साफ़ है की अगर हम शाकाहार पर जोर दें तो अमेरिका से कम अनाज उपलब्धता के बावजूद हमें ख़ास परेशानी नहीं होने वाली.इसी तरह अनाज का इस्तेमाल खाने के अलावा औद्योगिक कामों के लिए भी बढ़ चढ़ कर हो रहा है फिर चाहें बात बयोफुएल तय्यार करने की हो या गडिओं को चलाने के लिए जरूरी इंधन पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनाल तय्यार करने की जरूरत-इन सबके लिए धड़ल्ले से अनाज का इस्तेमाल किया जा रहा है.
इन सारे कारणों से खाद्दान्नों पर दबाव बढ़ा है और पर्याप्त उपलब्ध होने के बावजूद लोग भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं.इसी वजह से अगर हम उपभोग की प्रक्रति में बदलाव ला सकें और अनाज के औद्योगिक प्रयोगों को सीमित करके दुसरे विकल्प अपना सकें तो इस परेशानी का हल मुमकिन है और बढती हुई आबादी को हम भरपूर खाद्दान्न उपलब्ध करवा सकेंगे.ये सरकार की नीतिगत युजना का हिस्सा है कि वह इसे किस तरह हल करना चाहती है.
बढती आबादी का एक और जबरदस्त असर सामाजिक सांस्क्रतिक भी होता है.भारत की कुल आबादी का ३३% हिस्सा शहरों में रहने लगा है,और हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है.आने वाले वक़्त में शहरी करण की यह प्रव्रत्ति और भी तेज़ होगी और हम ये भी जानते हैं की आज शहरों में एक बड़े हिस्से के पास समुचित साधन नहीं हैं.


























