प्राक्रतिक आपदा के रूप में जब अचानक महाविनाश का तांडव नाचता है तब जनसंचार की भूमिका उस विनाश में घिरे लोगों के लिए भगवान से कम नहीं होती है.प्राक्रतिक आपदा आने पर सबसे पहले बिजली के कनेक्शन टूटते हैं और कनेक्शन टूटने से आपदा-ग्रस्त लोगों के घरों में घनघोर अँधेरा छा जाता है क्यूंकि इन्वेर्टर या जेनरेटर आदि भी सीमित समय तक ही चल पाते हैं,बिजली न होने से इसकी चार्जिंग नहीं हो पाती.इसके साथ ही फ़ोन,मोबाइल,कंप्यूटर आदि से संचार के सारे रस्ते बंद हो जाते हैं.जब आपदा ग्रस्त लोगो का संपर्क दूर बैठे अपने रिश्तेदारों से भी टूट जाता है तो ऐसे समय में जनसंचार माध्यमों में कार्यरत रिपोर्टर अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें रिश्तेदारों से जोड़ने का प्रयास करते हैं.
यानी पल पल की ताज़ा जानकारी देने के सीधे प्रसारण से वे जुड़ जाते हैं.अपने मोबाइल या कैमरे से तुरंत वीडियो बनाकर हेड-ऑफिस भेजते रहते हैं और हेड ऑफिस से न्यूज़ प्रोडुसेर एंकर के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ तुरंत लगाकर लोगों को पल पल कि जानकारी देते रहते हैं.जैसे जब बिहार में बाढ़ आई थी तो जनसंचार माध्यमों के द्वारा लोगों तक खबर पहुचाई गई कि वहां पर युद्ध स्तर पर मदद की जाने कि जरूरत है.
कोसी नदी का कहर टूट जाने पर भी अख़बारों में भी विश्लेषण शुरू हो गया कि आखिर प्रतिवर्ष बिहार में बाढ़ क्यूँ आ जाती है.खोजी पत्रकार नये नये तथ्य खोजकर लाये उनमें से एक खुलासा ये भी हुआ कि कोसी नदी के तट बंध का भी विधिवत शिलान्यास 14 जनवरी 1995 को किया गया था.इतने वर्षों में कई बार कोसी नदी का तटबंध टुटा है,जिसमें व्यापक पैमाने पर भरी तबाही हुई है.बिहार में राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभारी आलोक चन्द्र ने अपने लेख में बाढ़ से पहले और बाढ़ के बाद लेख के जरिये चौंका देने वाले कुछ तथ्य पेश किये कि कोसी तटबंध के निर्माण और मरम्मत कार्य के लिए बिहार सरकार ने दो भारतीय ठेकेदारों को नेपाल में तैनात कर रखा था.इन दो ठेकेदारों ने नेपाल के दो छोटे कांट्रेक्टरों को ये काम सौंप दिया.ये दोनों छोटे कांट्रेक्टर बीते कई माह से ही इस काम के लिए और ज्यादा पैसे की मांग कर रहे थे.मांग पूरी नहीं होते देखकर इन ठेकेदारों ने स्थानीय युवकों को भड़काकर काम में बाधा खड़ी कर दी.बाँध टूटने के कुछ दिन पहले वीरपुर से एक इंजीनियर के जयिये तार-जाली,पत्थर,बोल्डर,जेनरेटर के साथ साथ मजदूरों की एक टीम गई.इस टीम ने तटबंध पर उगे पेड़ों एवं झाड़ियों को काटकर उसे मज़बूत करना चाहा,लेकिन यहाँ पेड़ों और झाड़ियों को ये कहकर नहीं काटने दिया गया कि ये कानून के खिलाफ है.स्थानीय लोगों के मुताबिक अगर उस दिन पेड़ और झाड़ी काटकर बाँध बाँधने दिया जाता तो ये कयामत न आती.खबर के मुताबिक ठेकेदारों ने 14 लोगों के खिलाफ शिकायत करते हुए स्थानीय प्रशासन को एक अर्जी दी थी कि ये लोग काम नहीं करने दे रहे हैं.इस सिलसिले में चार लोग गिरफ्तार भी हुए,लेकिन राजनीतिक पार्टियों के दबाव में उन चारों को फ़ौरन रिहा कर दिया गया.इस खबर से ये पता चलता है कि कोसी को कोसने के बजाये नेताओं को कोसा जाना चाहिए.जिनकी लापरवाही से तटबंध टूटे.टी.वी .पर उन दिनों चर्चा-परिचर्चा के कार्यक्रमों में भी मंत्रियों से विचार-विमर्श किया गया और उन्हें चेतावनी दी गई.इन्ही चर्चाओं में एक और राज़ खुलकर आया की बिहार के भ्रष्ट नेता बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए मिलने वाले करोड़ों रूपये के सरकारी अनुदान पर नज़रें गड़ाये बैठे रहते हैं.
कहीं अचानक आतंकवादी बम विस्फोट करते हैं तो फ़ौरन उस जगह से जुड़े रिपोर्टर वीडियो बनाकर अपने चैनल को भेज देते हैं और चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में फ़ौरन प्रसारित कर देता है.२ नवम्बर 2008 को मुंबई के ताज होटल.ओबराई और नरीमन हाउस को आतंकवादिओं ने अपना निशाना बनाया तो मीडिया ने पूरे 60 घंटे तक के खौफनाक मंज़र की पल पल की
ताज़ा खबर पूरी दुनिया के सामने पेश की.इतना ही नहीं मीडिया ने पूरी तरह खोजकर सबूत पेश किये. जिससे पूरी दुनिया को पता चल गया कि ''इन आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तय्यबा का हाथ है जिसे आई.एस.आई का आशीर्वाद हुआ है.सब जानते हैं कि लश्कर के उद्देश्य क्या हैं-वह ईसाईयों,यहूदिओं और हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन मानता है.इसका मकसद है इस्लाम को हरा झंडा वाशिंगटन,यरूश्ल्य और नई दिल्ली पर फेहराना''.आतंकवादिओं के इन मंसूबों से पूरी दुनिया को परिचित करने में मीडिया ने एहम भूमिका निभाई.होटल के अन्दर फंसे भारतीय और विदेशी लोगों के साथ उनके परिजनों को जोड़ने में भी मीडिया का सराहनीय योगदान रहा.देश विदेश में बसे उनके परिजनों को पूरे 60 घंटे तक के मंज़र की पल पल का आँखों देखा हाल दिखाया और सुनाया गया.इन धमाकों से जुड़े हर पहलु को सामने लाने में मीडिया ने कोई कसार नहीं छोड़ी.पकड़े गये एक आतंकवादी अमजद कसाब के घर तक कि रिपोर्ट ख़ुफ़िया कैमरों के ज़रिये पेश करने का काम भी मीडिया कर्मियों ने ही किया.
युद्ध काल में मीडिया कि भूमिका और भी अहम् हो जाती है.युद्ध काल में सैनिकों तक सन्देश पहुचाने के लिए रेडियो और टी.वी बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं.रेडियो एक तरफ सैनिकों को देश दुनिया के समाचार सुनाता है,तो दूसरी ओर उसके माध्यम से युद्ध के मोर्चे के समाचार संसार को सुनाता है.1990 में सेटेलाइट से जुड़ने के बाद सी.एन.एन ने अमेरिका द्वारा कुवेत पर किये गये हमले का सीधा प्रसारण करके पहली बार युद्ध काल की रिपोर्टिंग के मायने बदल दिए.लोगों ने पहली बार युद्ध का सीधा प्रसारण देखा मिसायलें चलते हुए.बड़ी-बड़ी बस्तिओं को आग के हवाले होते हुए देखा उसके बाद अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हवाई हमले और उसके बाद उन दोनों भवनों को धराशाई होते देखा.अमेरिका द्वारा 1990 में इराक पर हमला और उसके बाद जवाबी कार्यवाही के रूप में ओसामा बिन लादेन का ट्रेड सेंटर पर हवाई हमला दिखाकर युद्ध की निसरारता को भी दिखने का काम किया.मीडिया के माध्यम से इस युद्ध को लेकर यह सच निकलकर सामने आया कि तेल के कुँओं पर कब्जा करके इराक को कमज़ोर बनाने के लिए अमेरिका ने यह युद्ध इराक पर थोपा था.युद्ध से पहले अमेरिका उन अस्त्रों को पूरी तरह ख़त्म करके पूरी मानवता को बचाना चाहता है.मीडिया ने तटस्थ होकर इस सन्दर्भ में अपनी भूमिका निभाई और अमेरिका के नापाक इरादों की पोल संसार के सामने खोल दी.
इस तरह हम मीडिया कि भूमिका विभिन्न रूपों में देख सकते हैं...
यानी पल पल की ताज़ा जानकारी देने के सीधे प्रसारण से वे जुड़ जाते हैं.अपने मोबाइल या कैमरे से तुरंत वीडियो बनाकर हेड-ऑफिस भेजते रहते हैं और हेड ऑफिस से न्यूज़ प्रोडुसेर एंकर के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ तुरंत लगाकर लोगों को पल पल कि जानकारी देते रहते हैं.जैसे जब बिहार में बाढ़ आई थी तो जनसंचार माध्यमों के द्वारा लोगों तक खबर पहुचाई गई कि वहां पर युद्ध स्तर पर मदद की जाने कि जरूरत है.
कोसी नदी का कहर टूट जाने पर भी अख़बारों में भी विश्लेषण शुरू हो गया कि आखिर प्रतिवर्ष बिहार में बाढ़ क्यूँ आ जाती है.खोजी पत्रकार नये नये तथ्य खोजकर लाये उनमें से एक खुलासा ये भी हुआ कि कोसी नदी के तट बंध का भी विधिवत शिलान्यास 14 जनवरी 1995 को किया गया था.इतने वर्षों में कई बार कोसी नदी का तटबंध टुटा है,जिसमें व्यापक पैमाने पर भरी तबाही हुई है.बिहार में राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभारी आलोक चन्द्र ने अपने लेख में बाढ़ से पहले और बाढ़ के बाद लेख के जरिये चौंका देने वाले कुछ तथ्य पेश किये कि कोसी तटबंध के निर्माण और मरम्मत कार्य के लिए बिहार सरकार ने दो भारतीय ठेकेदारों को नेपाल में तैनात कर रखा था.इन दो ठेकेदारों ने नेपाल के दो छोटे कांट्रेक्टरों को ये काम सौंप दिया.ये दोनों छोटे कांट्रेक्टर बीते कई माह से ही इस काम के लिए और ज्यादा पैसे की मांग कर रहे थे.मांग पूरी नहीं होते देखकर इन ठेकेदारों ने स्थानीय युवकों को भड़काकर काम में बाधा खड़ी कर दी.बाँध टूटने के कुछ दिन पहले वीरपुर से एक इंजीनियर के जयिये तार-जाली,पत्थर,बोल्डर,जेनरेटर के साथ साथ मजदूरों की एक टीम गई.इस टीम ने तटबंध पर उगे पेड़ों एवं झाड़ियों को काटकर उसे मज़बूत करना चाहा,लेकिन यहाँ पेड़ों और झाड़ियों को ये कहकर नहीं काटने दिया गया कि ये कानून के खिलाफ है.स्थानीय लोगों के मुताबिक अगर उस दिन पेड़ और झाड़ी काटकर बाँध बाँधने दिया जाता तो ये कयामत न आती.खबर के मुताबिक ठेकेदारों ने 14 लोगों के खिलाफ शिकायत करते हुए स्थानीय प्रशासन को एक अर्जी दी थी कि ये लोग काम नहीं करने दे रहे हैं.इस सिलसिले में चार लोग गिरफ्तार भी हुए,लेकिन राजनीतिक पार्टियों के दबाव में उन चारों को फ़ौरन रिहा कर दिया गया.इस खबर से ये पता चलता है कि कोसी को कोसने के बजाये नेताओं को कोसा जाना चाहिए.जिनकी लापरवाही से तटबंध टूटे.टी.वी .पर उन दिनों चर्चा-परिचर्चा के कार्यक्रमों में भी मंत्रियों से विचार-विमर्श किया गया और उन्हें चेतावनी दी गई.इन्ही चर्चाओं में एक और राज़ खुलकर आया की बिहार के भ्रष्ट नेता बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए मिलने वाले करोड़ों रूपये के सरकारी अनुदान पर नज़रें गड़ाये बैठे रहते हैं.
कहीं अचानक आतंकवादी बम विस्फोट करते हैं तो फ़ौरन उस जगह से जुड़े रिपोर्टर वीडियो बनाकर अपने चैनल को भेज देते हैं और चैनल ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में फ़ौरन प्रसारित कर देता है.२ नवम्बर 2008 को मुंबई के ताज होटल.ओबराई और नरीमन हाउस को आतंकवादिओं ने अपना निशाना बनाया तो मीडिया ने पूरे 60 घंटे तक के खौफनाक मंज़र की पल पल की
ताज़ा खबर पूरी दुनिया के सामने पेश की.इतना ही नहीं मीडिया ने पूरी तरह खोजकर सबूत पेश किये. जिससे पूरी दुनिया को पता चल गया कि ''इन आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तय्यबा का हाथ है जिसे आई.एस.आई का आशीर्वाद हुआ है.सब जानते हैं कि लश्कर के उद्देश्य क्या हैं-वह ईसाईयों,यहूदिओं और हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन मानता है.इसका मकसद है इस्लाम को हरा झंडा वाशिंगटन,यरूश्ल्य और नई दिल्ली पर फेहराना''.आतंकवादिओं के इन मंसूबों से पूरी दुनिया को परिचित करने में मीडिया ने एहम भूमिका निभाई.होटल के अन्दर फंसे भारतीय और विदेशी लोगों के साथ उनके परिजनों को जोड़ने में भी मीडिया का सराहनीय योगदान रहा.देश विदेश में बसे उनके परिजनों को पूरे 60 घंटे तक के मंज़र की पल पल का आँखों देखा हाल दिखाया और सुनाया गया.इन धमाकों से जुड़े हर पहलु को सामने लाने में मीडिया ने कोई कसार नहीं छोड़ी.पकड़े गये एक आतंकवादी अमजद कसाब के घर तक कि रिपोर्ट ख़ुफ़िया कैमरों के ज़रिये पेश करने का काम भी मीडिया कर्मियों ने ही किया.
युद्ध काल में मीडिया कि भूमिका और भी अहम् हो जाती है.युद्ध काल में सैनिकों तक सन्देश पहुचाने के लिए रेडियो और टी.वी बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं.रेडियो एक तरफ सैनिकों को देश दुनिया के समाचार सुनाता है,तो दूसरी ओर उसके माध्यम से युद्ध के मोर्चे के समाचार संसार को सुनाता है.1990 में सेटेलाइट से जुड़ने के बाद सी.एन.एन ने अमेरिका द्वारा कुवेत पर किये गये हमले का सीधा प्रसारण करके पहली बार युद्ध काल की रिपोर्टिंग के मायने बदल दिए.लोगों ने पहली बार युद्ध का सीधा प्रसारण देखा मिसायलें चलते हुए.बड़ी-बड़ी बस्तिओं को आग के हवाले होते हुए देखा उसके बाद अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हवाई हमले और उसके बाद उन दोनों भवनों को धराशाई होते देखा.अमेरिका द्वारा 1990 में इराक पर हमला और उसके बाद जवाबी कार्यवाही के रूप में ओसामा बिन लादेन का ट्रेड सेंटर पर हवाई हमला दिखाकर युद्ध की निसरारता को भी दिखने का काम किया.मीडिया के माध्यम से इस युद्ध को लेकर यह सच निकलकर सामने आया कि तेल के कुँओं पर कब्जा करके इराक को कमज़ोर बनाने के लिए अमेरिका ने यह युद्ध इराक पर थोपा था.युद्ध से पहले अमेरिका उन अस्त्रों को पूरी तरह ख़त्म करके पूरी मानवता को बचाना चाहता है.मीडिया ने तटस्थ होकर इस सन्दर्भ में अपनी भूमिका निभाई और अमेरिका के नापाक इरादों की पोल संसार के सामने खोल दी.
इस तरह हम मीडिया कि भूमिका विभिन्न रूपों में देख सकते हैं...



