Sunday, 27 November 2011

aazadi abhi bhi baki hai?

25 नवम्बर के दिन को संयुक्त राष्ट ने इंटरनेशनल डे फॉर दि एलिमिनेशन ऑफ़ वोयलेंस अगेंस्ट वुमन घोषित किया है.इसका मकसद है महिला विरोधी हिंसा को रोकने के लिए जागरूकता फैलाना.सरकारों और गैरसरकारी संगठनों से अपेक्षा की जाती है कि वह इस मुद्दे पर लोगों में चेतना फेलायेंगे और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने कि कोशिश करेगे .हालाँकि ऐसे प्रयास वर्षों से जारी है मगर आज भी महिला विरोधी हिंसा में कमी नहीं आई है.
यूँ टू आज भारत को आज़ाद हुए 64 साल हो चुके है लेकिन शायद यहाँ अभी भी महिलाओं को पूरी तरह से आज़ादी मिलना बाकी है क्यूंकि देश में अभी भी औरतों को कई स्तर पर हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.हिंसा शारीरिक ही नहीं,
मानसिक भी होती है.महिलाओं के रहन सहन और सोच को लेकर ताने दिए जाते हैं.उनकी पोशाक को लेकर फरमान जारी किये जाते हैं.ये सब भी उनके खिलाफ वोयेलेंस का ही एक रूप है.
           मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल के बाद अब उत्तर प्रदेश कि खाप पंचायत ने लड़कियों के जींस टॉप पहनने पर रोक लगा दि है.कारण यह बताया गया कि ऐसे वेस्टर्न पहनावों के कारण छेड़ छाड़ के मामले बढ रहे हैं.लड़कियों का यही पहनावा प्रेमी युगल के भागने का और उनके साथ दुव्यर्वहार का कारण बन रहा है.इसे लागू करने के लिए पाँच महिलाओं कि एक टीम का भी गठन किया गया है.खाप का यह फैसला अन्यायपूर्ण है और हास्यास्पद भी.यदि लड़कियों का पहनावा ही उनके साथ होने वाले अभ्रद व्यवहार का कारण है,तो जो लड़कियां जींस के बजाये सलवार कमीज़ पहनती हैं,उनके साथ छेड़खानी क्यूंकि हो जाती है?यहाँ तक कि अधेड़ उम्र कि औरतों के साथ भी चलते फिरते दुर्व्यवहार हो जाता है.छोटी-छोटी बच्चियों तक के साथ भी इस तरह का व्यवहार होते देखा गया है.उनके लिए कौनसी पाबन्दी पेश करने वाली है ये पंचायतें?
       दरअसल इन पंचायतों ने तमाम सामाजिक-आर्थिक बदलावों से अपनी आँखें मूँद रखीं हैं.वे अब भी मध्ययुगीन मानसिकता में जी रही हैं और समाज को भी उसी युग में रखना चाहती हैं.लेकिन शिक्षित और संभ्रात कहलाने वाला तबका भी औरतों के प्रति पिछड़े रवय्ये का शिकार है.यदि किसी लड़की के साथ छेड़खानी होती है तो यह तबका तुरंत अपना यह निर्णय सुनाएगा -उस लड़की के ही रंग ढंग ऐसे होंगे या पहनावा ही ऐसा होगा.  मानो उस व्यक्ति कि कोई गलती ही नही,जो लड़कियों के साथ दुव्यर्वहार कर रहा है.वह सब कुछ करके भी पाक साफ़ है और लड़कियों ने पहनावा बदल कर ही जैसे भारी गुनाह कर दिया हो.पढ़े लिखे परिवारों में भी जहाँ कुछ परिवार अपनी बेटी कि सुरक्षा के लिए उसे कभी कपडे पहनने का ढंग बदलने को कहते है तो कभी देर शाम बाहर घूमने से रोकते है.मगर कभी उसे अपने हक के लिए लड़ना नही सिखाते,क्यूंकि यदि लड़कियां किसी तरह की शिकायतें घर ले आयें,तो उसे उनकी बदनामी का सबब मन जाता है.मनचले इसी बात का फायदा उठाते है.
            आज भी लड़कों को वित्तीय सुरक्षा के रूप में देखा जाता है और लड़कियों को आश्रित प्राणी के रूप में.बोलने के ढंग से लेकर काम करने के सलीके तक,सब लड़कियों के लिए बने है.यही सोच बढकर सीमा पार करके धीरे धीरे दहेज हत्या,कन्या भ्रूण हत्या का रूप भी ले लेती है.लेकिन इन सबका पुरजोर विरोध करने के लिए कोई संगठन सामने नहीं आता.दिल्ली पुलिस ने सेल्फ डिफेन्स जेसे तमाम ऐसे कार्य क्रम चला रखें हैं, जिनसे महिलाओं को सशक्त किया जा सके.लेकिन जब परिवार वाले अपनी बच्चियों को ऐसे कार्यकर्मों में जाने की इजाज़त ही नहीं देगें तो इसका क्या फायदा होगा.दुरभाग्य से अपनी लड़कियों को रोकने टोकने का काम पिताओं के साथ साथ माएं भी करती हैं.औरतें अपने को स्वतंत्र और सुरक्षित समझ सकें,इसके लिए कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त बनाने की ज़रूरत है.औरतों को कई स्तरों पर अलग से प्रोत्साहन देने तथा उनके लिए कल्याण योजनायें भी चलानी होंगी.अगर उनकी सामाजिक हैसियत बदलेगी तो उनके प्रति समाज का रवय्या भी बदलेगा.

Saturday, 26 November 2011

'amebessador of peace award'se u.k parliment ne shri kumar swami ko sammanit kiya

           यू.के  पार्लिमेंट में परम पूज्य  श्री स्वामी कुमार जी को अम्बैसडर ऑफ़ पीस अवार्ड से सम्मानित किया गया .

अमेरिका  की  तरह 15 नवम्बर 2011 को यू.के. पार्लिमेंट ,प्रधानमंत्री वेस्ट मिनिस्टर पैलेस में सुनहरा इतिहास रचा गया.जहाँ आयोजित समारोह में ब्रह्म्श्री श्री कुमार स्वामी जी को विशेष रूप से सम्मानित  किया गया.विशव के इतिहास में पहली बार यू.के. पार्लिमेंट ने इस तरह भारत के किसी संत को सम्मानित किया.इस सम्मान समारोह में ब्रहाम्श्री श्री कुमार स्वामी जी को विश्व मानव कल्याण और सर्व सदभाव के लिए किये जा रहे विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया गया.
    इस समारोह की एक अनूठी  घटना ये भी रही की इसमें श्री कुमार स्वामी को'' अम्बेसडर ऑफ़ पीस''जैसे विश्व प्रसिद्ध अवार्ड से सम्मानित किया गया.शांति का ये पुरस्कार दुनिया के उन लोगो को दिया जाता है जिनका जीवन मानवता के लिए एक उदाहरण बन जाता है और जिनका जीवन विश्व शांति,नैतिक मूल्यों और सर्वधर्म समभाव को समर्पित हो.कुमार स्वामी जी को प्रसिद्ध महावीर सम्मानित किया गया.ये अवार्ड यंग इंडियन वेजेटेरियन सोसाइटी उन लोगो को देती है जिनकी जीवन शैली अति उत्तम सात्विक हो और जो हर तरह के प्राणियों के प्रति करुणा का भाव रखतें हैं.
  इसके अलावा एशियन वेलफेयर असोसिएशन ने स्वामी जी को द ह्यूमेन टेरियन अवार्ड से भी सम्मानित किया.ये खास अवार्ड हर ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो न सिर्फ दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत हों बल्कि समाज कल्याण में विशेष योगदान भी रखतें है.इस अनूठे व एतिहासिक सम्मान समारोह में संसद सदस्यों और अंतर राष्ट्रीय स्तर के सामाजिक संगठनों ने स्वामी जी के अभूतपूर्व योगदान और मानव कल्याण की खूब तारीफ़ भी की.
 इस समारोह में यू.के. पार्लिमेंट के अनेकों सांसद,हाउस ऑफ़ कॉमंस व हाउस ऑफ़ लोर्डस के अति वरिष्ठ अधिकारियों सहित अनेक विशिष्ट अतिथि मौजूद थे.संसद सदस्य श्री बैरी गार्नियर,श्री स्टीवन पाउंड,श्री गैरेथ थोमस,श्री बोब ब्लैक मैन,लोर्ड विलिमोरिया,लोर्ड तरसेम किंग ने विशेष सम्मान पत्रों के साथ कुमार स्वामी जी को सम्मानित किया.
श्री कुमार स्वामी जी को यु.के पार्लिमेंट की ओर से सम्मान पत्र सौपते हुए संसद श्री स्टीफन टीम्स ने कहा की स्वामी जी ने अपना जीवन विश्व को दुःख व पीड़ा से आज़ाद करने के लिए समर्पित किया है.इनके जीवन के जनकल्याणकारी उद्देशों और दर्शन को श्री लक्ष्मी नारायण धाम मूर्त रूप प्रदान कर रहा है.ये संस्थान दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक संस्थानों में से एक है.श्री कुमार स्वामी जी हर मत और धर के लोगो का लगातार कल्याण कर रहे है.जिसके कारण विश्व भर के लाखों लोग इनसे प्रेरणा प्राप्त कर रहे है.
श्री कुमार स्वमी जी को प्रदान किये गये सम्मान पात्र में कहा गया है कि स्वामी जी भारत की हजारों साल पुरानी आरोग्य एवं अदभुत पुरातन विधाओं के सिध्हस्त ज्ञाता है.इन्होंने भारत,अमेरिका,इंग्लॅण्ड,कनाडा,व यूरोप में मानव कल्याण हेतू विशाल समागमों में अपना नैतिक नेत्रत्व देकर मानव सेवा का अदभुत उदहारण प्रस्तुत किया है.स्वामी जी के दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा अनुयायी हैं.
सम्मान पत्र में ये भी कहा गया है कि भगवान् श्री नारायण धाम करोड़ों लोगों के लिए आशा कि किरण बन गया है और ये संस्थान लोगो के जीवन में स्वास्थ,विकास और सुख ला रहा है.श्री कुमार स्वामी जी द्वारा प्रदान किये जाने वाले दिव्य पाठ से अनेकों रोगों का निवारण हो रहा है.जिन लोगो ने जीने कि आशा छोड़ दी थी वे फिर आशा से भर उठें है.श्री कुमार स्वामी जी प्रयासों से शुरू हुआ भगवान् श्री लक्ष्मी नारायण धाम आज वैश्विक रूप ले चुका है.श्री कुमार स्वामी जी ने जो एक बीज बोया था वह अब एक विशाल वट पेड़ बन चुका है.
           इस एतिहासिक सम्मान समारोह में यु.के पार्लिमेंट के सांसदों को संबोधित करते हुए श्री कुमार स्वामी जी ने सहजता से कहा कि संसद द्वारा दिया गया ये सम्मान एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पुरे विश्व का है,पुरातन मर्यादा का है.इससे बढकर ये सम्मान हिंदु,मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध,जैन,पारसी सहित दुनिया के सभी धर्मों और उन्हें मानने वाले लोगो का सम्मान है.स्वामी जी ने ये भी कहा कि ये एतिहासिक सम्मान व्यक्ति विशेष न होकर भिन्न-भिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों का है.वास्तव में यह सम्मान पूरी मानवता का सम्मान है.इस सम्मानता से ग्रेट ब्रिटेन की उदारता और महानता  साफ़ देखी  जा सकती है.

Tuesday, 22 November 2011

matr divas

8 मई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माँ दिवस के रूप में मनाने का चलन चल पड़ा है.उसके बावजूद इस दिवस पर माँ एवं संतान के बीच  कैसा प्राक्रतिक एवं मानसिक रिश्ता होता है,उसके बारे में बहुत कम चर्चा होती है.
        पिंडज रूप में उत्पन्न होने वाले जीव में पिता की सहभागिता को नकारा नहीं जा सकता पर हर पिंडज जीव की माँ प्राक्रतिक नियम के अनुसार अपनी संतान को गर्भ में पालती है.जो वह खाती है,गर्भनाल द्वारा उसके गर्भ में पलने वाली उसकी संतान को मिलता है.गर्भ में पल रहे बच्चे का स्वास्थ माँ  के स्वास्थ पर निर्भर करता  है.अंडज वाले जीव पर भी यही नियम लागू होता है.
                  मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है फिर भी अपनी पत्नी के गर्भ में पलने वाली अपनी संतान की पल-पल की हलचल को वह सीधी तौर महसूस नही कर सकता है यही कारण है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों का पूरी तरह से निर्वहन करने के बावजूद कम उम्र में संतान का अपनी माँ के प्रति और माँ का आजीवन संतान के प्रति बेहद लगाव होता है.किसी किसी तरह के कामों में उलझी माँ अपने नवजात कि दर्द भरी आवाज़ सुनकर इतनी बैचेन हो जाती है कि जिस रूप में होती है दौड़ती हुई वहां पहुचने कि कोशिश करती है.इससे पिता कि महत्ता कम नहीं होती पर तुलनात्मक स्तर पर माँ का स्थान पिता कभी नहीं ले सकता है.किसी कारण वश पिता के न रहने पर अशिक्षित माँ भी चार पांच बच्चों को पाल लेती है.सांसारिक विवशता में उलझने के कारण कोई और रास्ता न दिखाई दे तो अपने तन का सौदा करने को तय्यार हो जाती है पर बच्चे को भूख से मरने नही देती.
सभी धर्मों में माँ का बड़ा ऊँचा स्थान दिया गया है.इस्लाम में कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है.ईसाई धर्म में भी माँ बहुत ऊँचा स्थान है.सनातन धर्म में भी माँ का स्थान पिता कि अपेक्षा ऊँचा है.
विश्व माड;मय में सिर्फ जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम ही ऐसे महापुरुष थे जो पिता कि आज्ञा पाने पर माँ का सर धड़ से अलग कर लाये थे.पर पिता के प्रसन्न होने पर आशीर्वचन मांगने के आदेश पर उन्होंने पिता से माँ को पुन: जिंदा करने की प्रार्थना की थी और माँ जिंदा हो गई थी.इसे जिस रूप में लें पर यह भी माँ कि महत्ता उजागर होती है.
आज हम भले ही माँ दिवस मना लें पर हमारी शिक्षा का स्तर नैतिकता से इतनी दूर चला गया है कि माँ के ममत्व को नज़र अंदाज़ कर अपने सुख को सिर्फ अपनी जवान पत्नी और बच्चों तक ही सीमित कर लिया है.हम बड़ा से बड़ा सुख पाना चाहते है पर उसमें बूढी माँ का स्थान नहीं होता.माँ को अपने घर में किसी कोने में पड़े रहने को विवश कर देते हैं या वर्धाश्रम में पंहुचा देते है.ये कभी नहीं सोचते कि कैसे माँ ने अपने शारीरिक सुखों में कटौती करके हमें पाला पोसा एवं इस कदर आगे बढ़ाया है.हम सारी उपलब्धियों को निजी उपलब्धि मानते हैं जबकि व्यक्ति को माँ का सहयोग न मिले तो उससे एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल है.जीवन की मौलिक आवश्यकताओं को भी आदमी अकेले पैदा नहीं कर सकता.
         आज हम पैसों को ही सर्वोपरी मान बैठें हैं,जबकि जीवन में मिलने वाली साडी उपलब्धियों का मूलभाव है सुख अर्जित करना पर उस सुख का क्या फायदा?जो बूढी माँ को वर्धाश्रम में,फुटपाथों पर,दूसरों के रहमोंकरम पर जिंदगी गुज़ारने पर विवश कर दें.ये सुख तो ऐसा है जैसे जानवर को वध करते हुए कसाई पाता है.
   माँ जन्म से ही ये मान चलती है की लड़की अपनी ससुराल चली जाएगी लेकिन उसका बेटा बुढ़ापे में उसकी देखभाल वैसे ही करेगा जैसे बचपन में वह उसकी करती थी.बुढ़ापे में सारे शरीर के अंग शिथित हो जाते हैं.इसमें कुछ माएं अर्द्ध विक्षिप्त हो जाती हैं.अपने बच्चों को भी पहचान नही पाती हैं.अपने बेटे से ही कहती हैं मेरे बेटे को बुला दो,ऐसी स्थिति में अपने शारीरिक सुख के लिए माँ को अपने रिश्तेदारों के पास ये ऐसी जगह पर छोड़ देना क्या उचित होगा?जहाँ वह किसी से कुछ अधिकार पूर्ण नहीं कह सकती.
         माँ अपने बच्चे से प्यार करती है.इसे सर्वव्यापी वाक्य माना गया है.इसका अपवाद हो सकता है पर इस अपवाद के आधार पर सभी माँ को दोषी नही ठहराया जा सकता है.यदि स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में माता-पिता,गुरु,वर्धजनों आदि के प्रति सम्मान सेवा करने वाली शिक्षा अनिवार्य कर दी जाये तो हम नारी को भोग विषय वासना तक ही सीमित करके नहीं आकेंगे.उम्र समय और रिश्ते के आधार पर उनके प्रति हमारे सम्मान सूचक व्यवहार स्वत: जुड़ जायेंगे.फिर साल में एक दिन माँ दिवस मनाने की औपचारिकता का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा.

Tuesday, 8 November 2011

kanya bhrun hatya aur mahilaon ki haalat.

                                          लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार देने की 
                                          गंदी सोच आज भी हमारे समाज में बरकरार है.
                                           वक़्त है ऐसी गंदी सोच को ख़त्म करने का.

कन्या भ्रूण हत्या हमारे देश के समाज की भयानक समस्याओं में से एक है.भ्रूण हत्या भी एक तरह से आतंकवाद है जो साफ़ दिखाई नहीं देता.भ्रूण हत्या सिर्फ लड़कियों की पहचान होने पर ही कराई जाती है.जहाँ एक ओर लोकसभा या राज्यसभा में महिलाओं को 33 % आरक्षण देने की योजना पर ज़ोर दिया जाता है.वहीं दूसरी ओर लड़की के पैदा होने से पहले ही उसकी गर्भ में जाँच करवा कर उन्हें मार दिया जाता है.
पढ़ लिखकर क्या करेगी? ज़रा जबान पर फिसलते इन जुमलों को देखें,अंदाज़ा हो जायेगा कि औरतों को लेकर सामाजिक धारणाएं क्या हैं:-औरत हो औरत कि तरह रहो, लड़की ज़ात हो दूसरे के घर जाना है,क्या लड़कों कि तरह उछल रही है.
भारत और चीन में 100 लड़कियों के मुकाबले 125 लड़कों का प्रतिशत बताया जा रहा है और इसका कारण है कि गर्भ में बेटियों की पहचान करा कर उनकी भ्रूण हत्या.क्यूंकि उन्हें दूसरे के घर जाना है अत: उनकी परवरिश      पर लगने वाला पैसा फालतू है और बेटे को अपने घर में रहना है इसलिए उसकी परवरिश में लगा पैसा इन्वेस्टमेंट है.
भ्रूण हत्या  की इस सोच से भी होती हैं कि लड़कियों को पालने में धन और ऊर्जा को खर्च करना पड़ता है क्यूंकि लड़कियां नौकरी भी करने लगे तो उन्हें मोटा दहेज देना पड़ेगा ऐसी सोच होती है.
पिछले कई वषों में औरतों की स्तिथि में आये बदलाव ने उनकी समाज में हालत बदली है.रेल इंजन से अंतरिक्षयान चलाने,कंप्यूटर और व्यापार में बड़े पैमाने पर साझेदारी करने,बैंकिंग में वर्चस्व बनाने,राजनीति में साझेदारी करके विज्ञानं में हाथ आज़माने जैसी पहल करके उन्होंने शहरी स्तर पर अपनी स्तिथि मज़बूत कि है.लेकिन शिक्षा कि स्तिथि वही ढाक के तीन पात जैसी है.सरपंच या मुखिया बनी महिलाएं अभी भी घूँघट में हैं और हस्ताक्षर के अलावा उनके सारे काम उनके पति या ससुर जी ही संचालित करते हैं.
अपनी इक्छा से जैसे ही औरतें कोई फेसला लेना चाहती है तो उसे गलत करार दे दिया जाता है.पुरुष कि इस सोच को बदलने कि ज़रूरत है.क्यूंकि यही सोच सदियों से महिलाओं का शोषण करती आई है.अब महिलाओं के उत्थान का समय आ गया है.
अत: नारी को सजावटी वस्तु मानने कि सोच और कन्या भ्रूण हत्या की अद्रश्य आतंकी गतिविधियों से खुद को बचा लेने का समय आ गया है.

Friday, 4 November 2011

kya anna p.m candidate bnege?

2014 में होने वाले पी.एम के लिए चुनावों में बी.जे. पी के आडवाणी,नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के राहुल गाँधी और मनमोहन सिंह के अनुभव को ध्यान में रखकर इनका नाम पी.एम उम्मीदवार के रूप में सामने लाया गया.कुछ कहते हैं की इनके अलावा कोई तीसरा भी आ सकता है.लेकिन शायद इस बीच हम अन्ना को भूल गये हैं.कोई भी राजनीतिक पार्टी उन्हें अपना उम्मीदवार बनाने की बात नही करती.
हमें अन्ना को पी.एम का उम्मीदवार बनाने के बारे में सोचना चाहिए.क्यूकि भ्रष्ट्राचार विरोधी उनके आन्दोलन को काफी समर्थन मिला है.जब वो अनशन पर बैठे तो हर वर्ग ने उनका साथ दिया.इसके अलावा संसद में भी उनका कितना सम्मान है,उनके अनशन को ख़त्म करने की गुज़ारिश की गई.
अगर अन्ना को पी.एम का उम्मीदवार बनाया जाये तो एक तो उन्हें जनता का पूरा समर्थन मिलेगा और दूसरे जन लोकपाल जैसे कई बिल जो जनता की भलाई के लिए होगें जल्दी ही पास हो सकते हैं और राजनीति का पूरा चरित्र ही बदल सकता है.

mass media in crisis

The role of mass media in crisis .......... Natural role of the mass media as a disaster when suddenly dancing orgy of mass destr...