Tuesday, 8 November 2011

kanya bhrun hatya aur mahilaon ki haalat.

                                          लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार देने की 
                                          गंदी सोच आज भी हमारे समाज में बरकरार है.
                                           वक़्त है ऐसी गंदी सोच को ख़त्म करने का.

कन्या भ्रूण हत्या हमारे देश के समाज की भयानक समस्याओं में से एक है.भ्रूण हत्या भी एक तरह से आतंकवाद है जो साफ़ दिखाई नहीं देता.भ्रूण हत्या सिर्फ लड़कियों की पहचान होने पर ही कराई जाती है.जहाँ एक ओर लोकसभा या राज्यसभा में महिलाओं को 33 % आरक्षण देने की योजना पर ज़ोर दिया जाता है.वहीं दूसरी ओर लड़की के पैदा होने से पहले ही उसकी गर्भ में जाँच करवा कर उन्हें मार दिया जाता है.
पढ़ लिखकर क्या करेगी? ज़रा जबान पर फिसलते इन जुमलों को देखें,अंदाज़ा हो जायेगा कि औरतों को लेकर सामाजिक धारणाएं क्या हैं:-औरत हो औरत कि तरह रहो, लड़की ज़ात हो दूसरे के घर जाना है,क्या लड़कों कि तरह उछल रही है.
भारत और चीन में 100 लड़कियों के मुकाबले 125 लड़कों का प्रतिशत बताया जा रहा है और इसका कारण है कि गर्भ में बेटियों की पहचान करा कर उनकी भ्रूण हत्या.क्यूंकि उन्हें दूसरे के घर जाना है अत: उनकी परवरिश      पर लगने वाला पैसा फालतू है और बेटे को अपने घर में रहना है इसलिए उसकी परवरिश में लगा पैसा इन्वेस्टमेंट है.
भ्रूण हत्या  की इस सोच से भी होती हैं कि लड़कियों को पालने में धन और ऊर्जा को खर्च करना पड़ता है क्यूंकि लड़कियां नौकरी भी करने लगे तो उन्हें मोटा दहेज देना पड़ेगा ऐसी सोच होती है.
पिछले कई वषों में औरतों की स्तिथि में आये बदलाव ने उनकी समाज में हालत बदली है.रेल इंजन से अंतरिक्षयान चलाने,कंप्यूटर और व्यापार में बड़े पैमाने पर साझेदारी करने,बैंकिंग में वर्चस्व बनाने,राजनीति में साझेदारी करके विज्ञानं में हाथ आज़माने जैसी पहल करके उन्होंने शहरी स्तर पर अपनी स्तिथि मज़बूत कि है.लेकिन शिक्षा कि स्तिथि वही ढाक के तीन पात जैसी है.सरपंच या मुखिया बनी महिलाएं अभी भी घूँघट में हैं और हस्ताक्षर के अलावा उनके सारे काम उनके पति या ससुर जी ही संचालित करते हैं.
अपनी इक्छा से जैसे ही औरतें कोई फेसला लेना चाहती है तो उसे गलत करार दे दिया जाता है.पुरुष कि इस सोच को बदलने कि ज़रूरत है.क्यूंकि यही सोच सदियों से महिलाओं का शोषण करती आई है.अब महिलाओं के उत्थान का समय आ गया है.
अत: नारी को सजावटी वस्तु मानने कि सोच और कन्या भ्रूण हत्या की अद्रश्य आतंकी गतिविधियों से खुद को बचा लेने का समय आ गया है.

mass media in crisis

The role of mass media in crisis .......... Natural role of the mass media as a disaster when suddenly dancing orgy of mass destr...